रविवार, सितंबर 12, 2010

...आक्रोश की बलि चढ़े बलिराम

इतिहास से दिलचस्प मुकाबले
इमरजेंसी के दौरान तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष बलिराम भगत भी जनता के आक्रोश ने नहीं बचे. छठी  लोकसभा के चुनाव में उन्हें बिहार की आरा संसदीय सीट से पराजय का सामना करना पड़ा. वह कुल छह बार लोकसभा के लिए चुने गए. 1952 में इस क्षेत्र से वह पहली बार चुनाव जीते. इसके बाद से वह लगातार दूसरी,  तीसरी,  चौथी और पांचवी लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए. जनता लहर ने उन्हें 1977 में हरा दिया. उनका मुकाबला लोकदल के प्रत्याशी चंद्रदेव वर्मा से था. लोकदल को 3,23,913 और कांग्रेस के पक्ष में 1,13,036 मत पड़े. भगत 21 हजार से ज्यादा मतों के अंतर से पराजित हुए. बलिराम भगत की उनके लम्बे राजनीतिक करियर में यह पहली हार थी. 1980 के आम चुनाव में उन्हें इस क्षेत्र से दोबारा पराजय का सामना करना पड़ा था, लेकिन बिहार की सीतामढ़ी संसदीय सीट से उपचुनाव जीत कर वे सदन पहुचने में कामयाब रहे.
1939 में मात्र 17 साल की उम्र में बलिराम भगत कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए. 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान वह कॉलेज की शिक्षा छोड़, स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए.  1944 में अखिल भारतीय विद्यार्थी कांग्रेस (एआईएससी) की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. 1946 में वह बिहार में एआईएससी के महासचिव बने. 1950  में भगत पहली बार प्रांतीय संसद के लिए निर्वाचित हुए. वह पहली बार 1956 में पंडित नेहरु के मंत्रिमंडल में शामिल हुए और वित्त उपमंत्री बने. वह लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की कैबिनेट में भी कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे. जनवरी 1976 में वह पांचवी लोकसभा के स्पीकर चुने गए. जीएस ढिल्लन के त्यागपत्र के बाद बलिराम भगत स्पीकर निर्वाचित हुए. उस समय देश में इमरजेंसी लग चुकी थी. बतौर लोकसभा अध्यक्ष उनका 14 माह का कार्यकाल एतिहासिक था. बतौर स्पीकर सांसदों के 'कालिंग अटेंशन'  के समय को उन्होंने घटाकर तीन- चार मिनट किया. इससे पहले इसकी अवधि 30 से 35 मिनट की थी.

1 टिप्पणी:

  1. ...acha kam kr rha han ramesh ji...blog dekha apka...bhartiya loktantra mein chunav sachmuch mahaparv ke trh ha...eska kai dilchasp jharoha apna khola han...kuch lekhon ko phla bhi pdh chuka hun...acha lga sara kam ek jagh apna ektha kr lia...bdhai...

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