रविवार, जून 26, 2011

पीएम पद किसी की जागिर नहीं : आडवाणी

साभार एलके आडवाणी का ब्लाग

कांग्रेस पार्टी के भीतर से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाए जाने की मांग के बीच भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने इस बात पर जोर दिया है कि भारत जैसे लोकतंत्र में प्रधानमंत्री पद को किसी एक परिवार की जागीर नहीं बनने दिया जाना चाहिए।
 आडवाणी ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि एक समय ऐसा था, जब कांग्रेस ऐसा व्यापक प्लेटफॉर्म था, जिसमें सभी क्षेत्रों के देशप्रेमियों को जगह मिली हुई थी। वास्तव में, यह महात्मा गांधी का ही आदेश था कि उस समय हिंदू महासभा से जुड़े डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और कांग्रेस के आलोचक डॉ. बीआर अंबेडकर को स्वतंत्रता के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में जगह मिली। उन्होंने लिखा है, 'दु:ख की बात ये है कि कांग्रेस आज सिर्फ एक परिवार की जागीर बन गई है। प्रधानमंत्री का पद या तो नेहरू परिवार के किसी सदस्य या उनके द्वारा नामांकित किसी व्यक्ति के लिए आरक्षित रह गया है। कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा नामंकित प्रधानमंत्री की भारत भारी कीमत चुका रहा है।"
 आडवाणी के मुताबिक, इसके बाद अब कांग्रेस पार्टी के भीतर से मांग उठ रही है कि नेहरू परिवार के एक वंशज को प्रधानमंत्री पद संभाल लेना चाहिए। भाजपा नेता ने लिखा, 'संप्रग सरकार जैसा शासन दे रही है, हमारा देश उसका भार ज्यादा दिन नहीं उठा सकता। भारत जैसे महान लोकतंत्र में प्रधानमंत्री पद किसी एक परिवार की जागीरदारी नहीं बनने दिया जाना चाहिए।

कश्मीर समस्या नेहरू परिवार का विशेष उपहार : आडवाणी का मानना है कि कश्मीर समस्या देश को दिया गया नेहरू परिवार का विशेष 'उपहार" है। विभाजन के समय इसका समाधान कर पाने में जवाहर लाल नेहरू की असफलता की देश भारी कीमत चुका रहा है। आडवाणी ने अपने ब्लॉग में  लिखा है, 'दु:ख की बात है कि न तो दिल्ली में नेहरू सरकार और न ही श्रीनगर में शेख अब्दुल्ला सरकार ने कभी इस बात को माना कि जम्मू-कश्मीर का भारत संघ में पूरी तरह एकीकरण करने की जरूरत है। शेख अब्दुल्ला के मामले में समस्या यह थी कि उनकी एक तरह से स्वतंत्र कश्मीर का एकछत्र नेता बनने की महत्वाकांक्षा थी, जबकि नेहरूजी की ओर से इस मामले में साहस और दूरदर्शिता की कमी रही।    
भारत ने गवाएं कई मौके : आडवाणी के मुताबिक, 'गौर करने वाली बात यह है कि गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल सभी दूसरी राजशाही वाली सियासतों का भारत संघ में एकीकरण करने में सफल रहे। जब उनमें से किसी ने दुविधा दिखाई या पाकिस्तान में शामिल होने की इच्छा जाहिर की, तो पटेल ने उन्हें उनकी जगह दिखा दी। उदाहरण के लिए, हैदराबाद के निजाम के सशस्त्र विद्रोह को कुचल दिया गया। उन्होंने लिखा है, 'जम्मू-कश्मीर राजशाही वाला एकमात्र ऐसा राज्य था, जिसे भारत से जोड़े जाने की प्रक्रि या सीधे प्रधानमंत्री नेहरू की देख-रेख में हो रही थी। कश्मीर को पाने के लिए भारत के खिलाफ पाकिस्तान की 1947 की पहली जंग ने भी नेहरू सरकार को इस बात का बेहतरीन मौका दिया था कि वह न केवल हमला करने वालों को खदेड़ देती, बल्कि पाकिस्तान के साथ हमेशा के लिए कश्मीर मुद्दे को सुलझा देती। भाजपा के वरिष्ठ नेता ने लिखा है कि भारत ने ऐसा दूसरा बड़ा मौका 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी गंवाया। इसमें भारत ने न केवल पाकिस्तान को हराया, बल्कि पाकिस्तान के लगभग 90,000 युद्धबंदी भी भारत में आ गए।
तोहफे के छह परिणाम : आडवाणी के मुताबिक, इस 'तोहफे" के छह परिणाम आज तक देखने को मिल रहे हैं। उन्होंने कहा, इसका पहला परिणाम, पाकिस्तान की ओर से सबसे पहले कश्मीर और बाद में भारत के विभिन्न हिस्सों में सीमा पार से आतंकवाद का निर्यात है। दूसरा, पाकिस्तान की ओर से कश्मीर और बाद में देश के दूसरे हिस्सों में फैले धार्मिक चरमपंथ का निर्यात। तीसरा, हमारे सुरक्षा बलों के हजारों जवानों और नागरिकों की मौत। चौथा, सैन्य और अद्र्धसैनिक बलों पर खर्च होने वाले हजारों करोड़ों रुपए। इसी की बदौलत बाहरी ताकतें भारत पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंधों का फायदा उठा रही हैं। इस तोहफे का अंतिम नुकसान कश्मीरी पंडितों के पूरे समुदाय को उठाना पड़ रहा है, जो अपनी जमीन से विस्थापित होकर अपनी ही मातृभूमि में शरणार्थी बन कर रहने को मजबूर हो गए हैं।
काम आया श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान : आडवाणी ने इस मामले में डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी के योगदान की चर्चा करते हुए लिखा है कि डॉ. मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को पृथक रखने के परिणामों को बहुत पहले ही महसूस कर लिया था। इसी के चलते उन्होंने प्रदेश के भारत में पूरी तरह विलय का सपना देखा। डॉ. मुखर्जी ने अपने इस अभियान को तीन स्तरों,  राजनीतिक, संसदीय और कश्मीर में मैदानी स्तर पर अंजाम देने की योजना बनाई और 'सबसे पहले उन्होंने अक्तूबर, 1951 में कांग्रेस के राष्ट्रवादी विकल्प के तौर पर भारतीय जन संघ बनाया। इसका एजेंडा कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के अलावा, हाल ही में स्वतंत्र हुए भारत को समृद्ध बनाना था, जहां किसी के साथ जाति, धर्म, भाषा के आधार पर भेदभाव न हो। दूसरे स्तर के बारे में उन्होंने लिखा है कि 1952 में जब पहले आम चुनाव हुए, तब डॉ. मुखर्जी एक तरह से लोकसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर उभरे। यहां उन्होंने जम्मू-कश्मीर को लेकर कांग्रेस सरकार की

1 टिप्पणी:

  1. अच्छी रचना के लिए आभार. हिंदी लेखन के क्षेत्र में आप द्वारा किये जा रहे प्रयास स्वागत योग्य हैं.
    आपको बताते हुए हमें हर्ष का अनुभव हो रहा है की भारतीय ब्लॉग लेखक मंच की स्थापना ११ फरवरी २०११ को हुयी, हमारा मकसद था की हर भारतीय लेखक चाहे वह विश्व के किसी कोने में रहता हो, वह इस सामुदायिक ब्लॉग से जुड़कर हिंदी लेखन को बढ़ावा दे. साथ ही ब्लोगर भाइयों में प्रेम और सद्भावना की बात भी पैदा करे. आप सभी लोंगो के प्रेम व विश्वाश के बदौलत इस मंच ने अल्प समय में ही अभूतपूर्व सफलता अर्जित की है. आपसे अनुरोध है की समय निकलकर एक बार अवश्य इस मंच पर आये, यदि आपको मेरा प्रयास सार्थक लगे तो समर्थक बनकर अवश्य हौसला बुलंद करे. हम आपकी प्रतीक्षा करेंगे. आप हमारे लेखक भी बन सकते है. पर नियमो का अनुसरण करना होगा.
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