बुधवार, फ़रवरी 02, 2011
रविवार, जनवरी 30, 2011
पांच राज्यों में आगामी विधानसभा चुनाव
कांग्रेस : गठजोड़ के रोड़े
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु समेत देश के पांच राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों के लिहाज से क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन का मुद्दा कांग्रेस के लिए पेचीदा बना हुआ है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस एक तरह से खुद को प्रमुख पार्टी के तौर पर प्रदर्शित कर रही है। उधर 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में कठिनाई में आई द्रमुक की बात करें तो कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उनके पास तमिलनाडु में द्रमुक नीत गठजोड़ में शामिल होने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
ममता ने पिछले हफ्ते कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की थी, लेकिन दोनों नेताओं के बीच बातचीत के बारे में किसी भी तरफ से जानकारी नहीं दी गई। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव कुछ ही महीने बाद होने हैं और उनसे पहले नये साल में सोनिया-ममता की यह पहली मुलाकात है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि भी दिल्ली आ रहे हैं और वह अपने प्रदेश में गठबंधन पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से विचार विमर्श करेंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में चेन्नई में कहा था कि उनका गठबंधन मजबूत है।
तमिलनाडु के कांग्रेस नेता भी निजी तौर पर अलग धुन अलाप रहे हैं। उनका कहना है कि द्रमुक केंद्र की संप्रग सरकार में तीसरी सबसे बड़ी घटक पार्टी है। इसलिए कांग्रेस प्रदेश में अन्य किसी गठजोड़ के बारे में नहीं सोच सकती। एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'नेतृत्व चाहता है कि केंद्र सरकार सुरक्षित रहे आैर इसलिए हमें यह जानकर भी प्रदेश में द्रमुक के साथ रहना होगा कि वह 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में आलोचनाओं के घेरे में है।"
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस गठबंधन के लिए 294 में से 98 सीटें मांगने की प्रदेश कांग्रेस की योजना पर त्यौरियां चढ़ा ली हैं। इस मुद्दे पर प्रदेश के दोनों पार्टियों के नेताओं के बीच बहस सामने आ रही है।
इन दोनों प्रदेशों के अलावा केरल, असम और पुडुचेरी में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। केरल में कांग्रेस समान विचार वाले दलों के यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की अगुवाई कर रही है और गत लोकसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बाद गठजोड़ इस बार काफी उत्साह में है। प्रदेश में इस गठजोड़ का चिर प्रतिद्वंद्वी सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) है।
पुडुचेरी में कांग्रेस अपने दम पर सत्ता में है वहीं असम में यह बोडो दल के समर्थन से राज कर रही है। कांग्रेस महासचिव और असम में पार्टी मामलों के प्रभारी दिग्विजय सिंह के अनुसार प्रदेश में गठबंधन के बारे में अभी तक कोई फैसला नहीं किया गया है। संकेत यह भी मिलता है कि पार्टी अपने दम पर ही किस्मत आजमा सकती है।
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु समेत देश के पांच राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों के लिहाज से क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन का मुद्दा कांग्रेस के लिए पेचीदा बना हुआ है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस एक तरह से खुद को प्रमुख पार्टी के तौर पर प्रदर्शित कर रही है। उधर 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में कठिनाई में आई द्रमुक की बात करें तो कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उनके पास तमिलनाडु में द्रमुक नीत गठजोड़ में शामिल होने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
ममता ने पिछले हफ्ते कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की थी, लेकिन दोनों नेताओं के बीच बातचीत के बारे में किसी भी तरफ से जानकारी नहीं दी गई। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव कुछ ही महीने बाद होने हैं और उनसे पहले नये साल में सोनिया-ममता की यह पहली मुलाकात है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि भी दिल्ली आ रहे हैं और वह अपने प्रदेश में गठबंधन पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से विचार विमर्श करेंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में चेन्नई में कहा था कि उनका गठबंधन मजबूत है।
तमिलनाडु के कांग्रेस नेता भी निजी तौर पर अलग धुन अलाप रहे हैं। उनका कहना है कि द्रमुक केंद्र की संप्रग सरकार में तीसरी सबसे बड़ी घटक पार्टी है। इसलिए कांग्रेस प्रदेश में अन्य किसी गठजोड़ के बारे में नहीं सोच सकती। एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'नेतृत्व चाहता है कि केंद्र सरकार सुरक्षित रहे आैर इसलिए हमें यह जानकर भी प्रदेश में द्रमुक के साथ रहना होगा कि वह 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में आलोचनाओं के घेरे में है।"
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस गठबंधन के लिए 294 में से 98 सीटें मांगने की प्रदेश कांग्रेस की योजना पर त्यौरियां चढ़ा ली हैं। इस मुद्दे पर प्रदेश के दोनों पार्टियों के नेताओं के बीच बहस सामने आ रही है।
इन दोनों प्रदेशों के अलावा केरल, असम और पुडुचेरी में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। केरल में कांग्रेस समान विचार वाले दलों के यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की अगुवाई कर रही है और गत लोकसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बाद गठजोड़ इस बार काफी उत्साह में है। प्रदेश में इस गठजोड़ का चिर प्रतिद्वंद्वी सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) है।
पुडुचेरी में कांग्रेस अपने दम पर सत्ता में है वहीं असम में यह बोडो दल के समर्थन से राज कर रही है। कांग्रेस महासचिव और असम में पार्टी मामलों के प्रभारी दिग्विजय सिंह के अनुसार प्रदेश में गठबंधन के बारे में अभी तक कोई फैसला नहीं किया गया है। संकेत यह भी मिलता है कि पार्टी अपने दम पर ही किस्मत आजमा सकती है।
शनिवार, जनवरी 29, 2011
30 जनवरी : महात्मा गाँधी की पूरणतिथि......
...हिटलर के नाम बापू की पाती
पूरे जगत में सत्य, अहिंसा और भाईचारे का संदेश देते हुए अपना सर्वस्व बलिदान करने वाले बापू ने जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर को भी अहिंसा का पाठ पढ़ाया था और उनसे युद्ध का रास्ता छोड़ने का आग्रह किया था।
'महात्मा गांधी कम्प्लीट वक्र्स-वल्यूम 70" में प्रकाशित बापू के 23 जुलाई 1939 को लिखे पत्र में उन्होंने जर्मन तानाशाह को अहिंसा का महत्व समझाने का प्रयास किया था। बापू ने 24 दिसम्बर, 1940 को हिटलर को एक विस्तृत पत्र लिखा था, जब जर्मनी और इटली पूरे यूरोप पर कब्जा करने की ओर बढ़ रहे थे।
बापू पर शोध करने वाले डा. कोएनराद इल्स्ट ने अपनी पुस्तक में लिखा, महात्मा गांधी ने अपने पहले पत्र की शुरुआत में हिटलर को 'मित्र" रूप में संबोधित किया था। एक वर्ग के लोगों की आलोचना के बावजूद हिटलर को लिखे दूसरे पत्र में 'मित्र" संबोधन को स्पष्ट करते हुए कहा था, 'आपको मित्र संबोधन कोई औपचारिकता नहीं है। मैं पिछले 33 वर्षो से दुनिया में मानवता और बंधुत्व के प्रसार के लिए काम करता रहा हूं, चाहे वह किसी जाति, वर्ग, धर्म या रंग से जुड़ा क्यों न हो। मैं सार्वभौम बंधुत्व के सिद्धांत में विश्वास करता हूं।"
हिटलर को लिखे पत्र में महात्मा गांधी ने जर्मन तानाशाह की मदद से भारत की स्वतंत्रता के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। उन्होंने लिखा, 'हम कभी नहीं चाहेंगे कि देश में ब्रिाटिश शासन का खात्मा जर्मनी की मदद से हो, बल्कि अहिंसा ऐसा रास्ता है जो दुनिया की सबसे हिंसक शक्तियों के गठजोड़ को भी पराजित करने की क्षमता रखता है।"
हिटलर को लिखे पहले पत्र में बापू ने कहा, 'मेरे कई मित्र मुझसे मानवता के नाते आपको पत्र लिखने का आग्रह करते रहे हैं। लेकिन मैं उनके अनुरोध को ठुकराता रहा हूं, क्योंकि मुझे ऐसा लगता था कि मेरा आपको पत्र लिखना उचित नहीं होगा, लेकिन युद्ध की स्थिति को देखते हुए मैंने अपनी सोच को पीछे रखते हुए पत्र लिखा है।"
गांधी ने अपने दूसरे पत्र में जर्मन तानाशाह को लिखा, 'हम आपके हथियारों के सफल होने की कामना नहीं कर सकते। जिस प्रकार हम ब्रिाटेन के उपनिवेशवाद का विरोध करते हैं, उसी प्रकार से हम जर्मनी में नाज़ीवाद के भी विरोधी हैं। ब्रिाटेन का हमारा विरोध करने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हम ब्रिाटेन के लोगों को नुकसान पहुंचाना चाहते हों या युद्ध में पराजित करना चाहते हो। हम अहिंसा के रास्ते अपनी आजादी हासिल करना चाहते हैं।
शुक्रवार, जनवरी 28, 2011
-हर 12 मिनट में एक युवा करता है आत्महत्या
देश में हर चार मिनट में एक सुसाइड
देश में हर चार मिनट में कोई एक अपनी जान दे देता है। ऐसा करने वाले तीन लोगों में से एक युवा होता है। यानि देश में हर 12 मिनट में 30 वर्ष से कम आयु का एक युवा अपनी जान ले लेता है। ऐसा कहना है राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो का।
हाल ही में आए दुर्घटनाओं आैर आत्महत्या के कारण मौतों पर वर्ष 2009 के रेकार्ड के मुताबिक वर्ष 2009 में कुल 1,27,151 लोगों ने आत्महत्या की। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2009 में आत्महत्या के मामलों में 1.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2008 में आत्महत्या के 1,22,902 मामले थे जो वर्ष 2009 में बढ़कर 1,27,151 हो गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 'आत्महत्या करने वालों में 34.5 प्रतिशत की उम्र 15 से 29 साल के बीच थी, जबकि 34.2 प्रतिशत की उम्र 30 से 44 साल के बीच थी। दिल्ली और अरुणाचल प्रदेश में आत्महत्या करने वालों में 55 प्रतिशत से ज्यादा 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के थे।
इसके अनुसार, 'देश में रोज 223 पुरुष और 125 महिलाएं आत्महत्या करती हैं। इन महिलाओं में 69 घरेलू महिलाएं हैं। एक दिन में 73 लोग बीमारी के कारण और 10 लोग प्यार-मोहब्बत के चक्कर में आत्महत्या करते हैं।" 2009 में देश में सबसे ज्यादा आत्महत्याएं पश्चिम बंगाल में हुई। उसके बाद आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक में। इन पांच राज्यों में आत्महत्या करने वालों की कुल संख्या देश में आत्महत्या करने वालों की कुल संख्या का 55.1 प्रतिशत है। दक्षिण भारत के राज्यों आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल को मिला कर देश में कुल आत्महत्या का 32.2 प्रतिशत इन्हीं राज्यों में होता है। वर्ष 2009 में दिल्ली में 1,477 लोगों ने आत्महत्या की । वहीं उत्तर प्रदेश में आत्महत्या करने वालों की संख्या काफी कम रही।
देश में 23.7 प्रतिशत लोग पारिवारिक परेशानी और 21 प्रतिशत बीमारियों के कारण आत्महत्या करते हैं। प्यार-मोहब्बत के चक्कर में सिर्फ 2.9 प्रतिशत और दहेज झगड़ों, ड्रग्स और गरीबी के कारण 2.3 प्रतिशत लोग आत्महत्या करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 'पुरूष सामाजिक और आर्थिक परेशानियों के कारण तथा महिलाएं व्यक्तिगत और भावनात्मक कारणों से आत्महत्या करती हैं।"
रिपोर्ट के रोचक तथ्य
-1999 के मुकाबले 2009 में आत्महत्याओं की संख्या में 15 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
-1999 में 1,10,587 लोगों ने और 2009 में 1,27,151 लोगों ने आत्महत्या की।
-आत्महत्या करने वालों में पुरूष स्त्री का अनुपात 64:36 था।
-14 साल की उम्र तक के बच्चों में लड़का और लड़की का अनुपात 51:49 रहा।
-45.8 प्रतिशत पुरूष तथा 24.6 प्रतिशत विवाहित महिलाओं ने की आत्महत्या।
-केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में आत्महत्या करने वालों में से 54.7 प्रतिशत 60 वर्ष से ज्यादा उम्र के थे।
-कुल 2,951 बच्चों ने आत्महत्या की। इनमे से 54.5 प्रतिशत मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और तमिलनाडु में हैं।
-43.3 प्रतिशत आत्महत्याएं चार बड़े शहरों बंगलुरू, चेन्नई, दिल्ली और मुंबई में हुई।
आत्महत्या मामलें में शीर्ष राज्य
-पश्चिम बंगाल : 14,648
-आंध्रप्रदेश : 14,500
-तमिलनाडु 14,424
- महाराष्ट्र 14,300
-कर्नाटक 12,195
आत्महत्या के कारण
33.6 प्रतिशत : जहर खा कर
31.5 प्रतिशत : फांसी लगाकर
9.2 प्रतिशत : आत्मदाह करके
6.1 प्रतिशत : पानी में डूब कर
व्यावसायिक : 1,354
बेरोजगारी : 2,472
देश में हर चार मिनट में कोई एक अपनी जान दे देता है। ऐसा करने वाले तीन लोगों में से एक युवा होता है। यानि देश में हर 12 मिनट में 30 वर्ष से कम आयु का एक युवा अपनी जान ले लेता है। ऐसा कहना है राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो का।
हाल ही में आए दुर्घटनाओं आैर आत्महत्या के कारण मौतों पर वर्ष 2009 के रेकार्ड के मुताबिक वर्ष 2009 में कुल 1,27,151 लोगों ने आत्महत्या की। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2009 में आत्महत्या के मामलों में 1.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2008 में आत्महत्या के 1,22,902 मामले थे जो वर्ष 2009 में बढ़कर 1,27,151 हो गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 'आत्महत्या करने वालों में 34.5 प्रतिशत की उम्र 15 से 29 साल के बीच थी, जबकि 34.2 प्रतिशत की उम्र 30 से 44 साल के बीच थी। दिल्ली और अरुणाचल प्रदेश में आत्महत्या करने वालों में 55 प्रतिशत से ज्यादा 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के थे।
इसके अनुसार, 'देश में रोज 223 पुरुष और 125 महिलाएं आत्महत्या करती हैं। इन महिलाओं में 69 घरेलू महिलाएं हैं। एक दिन में 73 लोग बीमारी के कारण और 10 लोग प्यार-मोहब्बत के चक्कर में आत्महत्या करते हैं।" 2009 में देश में सबसे ज्यादा आत्महत्याएं पश्चिम बंगाल में हुई। उसके बाद आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक में। इन पांच राज्यों में आत्महत्या करने वालों की कुल संख्या देश में आत्महत्या करने वालों की कुल संख्या का 55.1 प्रतिशत है। दक्षिण भारत के राज्यों आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल को मिला कर देश में कुल आत्महत्या का 32.2 प्रतिशत इन्हीं राज्यों में होता है। वर्ष 2009 में दिल्ली में 1,477 लोगों ने आत्महत्या की । वहीं उत्तर प्रदेश में आत्महत्या करने वालों की संख्या काफी कम रही।
देश में 23.7 प्रतिशत लोग पारिवारिक परेशानी और 21 प्रतिशत बीमारियों के कारण आत्महत्या करते हैं। प्यार-मोहब्बत के चक्कर में सिर्फ 2.9 प्रतिशत और दहेज झगड़ों, ड्रग्स और गरीबी के कारण 2.3 प्रतिशत लोग आत्महत्या करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 'पुरूष सामाजिक और आर्थिक परेशानियों के कारण तथा महिलाएं व्यक्तिगत और भावनात्मक कारणों से आत्महत्या करती हैं।"
रिपोर्ट के रोचक तथ्य
-1999 के मुकाबले 2009 में आत्महत्याओं की संख्या में 15 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
-1999 में 1,10,587 लोगों ने और 2009 में 1,27,151 लोगों ने आत्महत्या की।
-आत्महत्या करने वालों में पुरूष स्त्री का अनुपात 64:36 था।
-14 साल की उम्र तक के बच्चों में लड़का और लड़की का अनुपात 51:49 रहा।
-45.8 प्रतिशत पुरूष तथा 24.6 प्रतिशत विवाहित महिलाओं ने की आत्महत्या।
-केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में आत्महत्या करने वालों में से 54.7 प्रतिशत 60 वर्ष से ज्यादा उम्र के थे।
-कुल 2,951 बच्चों ने आत्महत्या की। इनमे से 54.5 प्रतिशत मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और तमिलनाडु में हैं।
-43.3 प्रतिशत आत्महत्याएं चार बड़े शहरों बंगलुरू, चेन्नई, दिल्ली और मुंबई में हुई।
आत्महत्या मामलें में शीर्ष राज्य
-पश्चिम बंगाल : 14,648
-आंध्रप्रदेश : 14,500
-तमिलनाडु 14,424
- महाराष्ट्र 14,300
-कर्नाटक 12,195
आत्महत्या के कारण
33.6 प्रतिशत : जहर खा कर
31.5 प्रतिशत : फांसी लगाकर
9.2 प्रतिशत : आत्मदाह करके
6.1 प्रतिशत : पानी में डूब कर
व्यावसायिक : 1,354
बेरोजगारी : 2,472
शनिवार, जनवरी 15, 2011
१६ जनवरी : धार्मिक स्वतंत्रता दिवस
भारत की धार्मिक सहिष्णुता की दुनिया देती है दाद
दुनियाभर में आधुनिकता आैर सहिष्णुता की शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद मजहबी कट्टरपन बढ़ रहा है। धार्मिक स्वतंत्रता पर हमले हो रहे हैं। हालांकि, भारत कभी कभार धर्म के नाम पर दंगे हो जाते हैं, लेकिन इनके पीछे धार्मिक स्वतंत्रता को दबाने का उद्देश्य नहीं होता। आज पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सूडान, इराक, यमन, नाइजीरिया आैर इनके अतिरिक्त बहुत से मुल्कों में हिंसा चरम पर है। इसके पीछे कहीं न कहीं धार्मिक कट्टरपन जिम्मेदार है।अप्रैल 2006 में भेजे गए इस संदेश को गार्जियन अखबार ने प्रकाशित किया जिसमें भारत की धर्म निरपेक्ष प्रकृति आैर धार्मिक सहिष्णुता की जमकर तारीफ की गई। इसमें कहा गया कि आज जब बहुत से देशों में धर्म के नाम पर चरमपंथ बढ़ रहा है, ऐसे में भारत सही दिशा की ओर अग्रसर है। धार्मिक स्वतंत्रता निगरानी समिति ने हाल ही में भारत में भी धार्मिक स्वतंत्रता का अध्ययन किया आैर कहा कि इस मामले में कुल मिलाकर भारत की स्थिति अच्छी है।
समिति ने कहा कि भारत के लोग उदार हैं आैर अल्पसंख्यक निर्भीक होकर अपने धर्म का पालन करते हैं। उनकी धार्मिक स्वतंत्रता पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं है। निगरानी समिति ने हालांकि यह भी कहा कि कुछ राज्य सरकारें धर्म परिवर्तन विरोधी कानून बनाकर धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करने की कोशिश करती हैं।
गुरुवार, जनवरी 13, 2011
एक पर्व, नाम अनेक
संक्रांति संस्कृत का शब्द है, जो सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश बताता है। भारत में मनाए जाने वाले पर्वों में यह एकमात्र ऐसा पर्व है, जो सौर कैलेंडर पर आधारित है। इसकी वजह से यह पर्व हर साल 14 जनवरी को हर मनाया जाता है। शेष सभी पर्व चंद्र कैलेंडर पर आधारित होते हैं।
वैज्ञानिक फैक्टर : हिंदू ज्योतिष के अनुसार, कुल बारह राशियां होती हैं। इस प्रकार संक्रांति भी 12 हुईं। लेकिन मकर संक्रांति तब मनाई जाती है, जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। देश में मनाए जाने वाले अन्य पर्वों की तारीख बदलती रहती है, क्योंकि वह चंद्र कैलेंडर पर आधारित होते हैं आैर चंद्रमा की गति सूर्य की तुलना में अधिक होती है। दरअसल, पृथ्वी को कर्क आैर मकर रेखाएं काटती हैं। जब सूर्य कर्क रेखा को पार करता है तो पृथ्वी के आबादी वाले हिस्से में उसका प्रकाश कम आता है। इसी दौरान धनु में सूर्य का संचार होने पर सर्दी अधिक हाती है, जबकि मकर में सूर्य का संचार होने पर सर्दी कम होने लगती है। मकर संक्राति से गर्मी तेज होने लगती है। उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद, वाराणसी आैर हरिद्वार में गंगा के घाटों पर तड़के ही श्रद्धालु पहुंच कर स्नान करते हैं। उत्तराखंड में इस पर्व की खास धूम होती है। इस दिन गुड़, आटे आैर घी के पकवान पकाए जाते हैं आैर इनका कुछ हिस्सा पक्षियों के लिए रखा जाता है।
मकर संक्रांति भारत के अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस पर्व को 'तिलगुल" कहा जाता है। महाराष्ट्र में इस पर्व पर घर के लोग सुबह पानी में तिल के कुछ दाने डाल कर नहाते हैं। महिलाएं रंगोली सजाती हैं आैर पूजा की जाती है। पूजा की थाली में तिल जरूर रखा जाता है। इसी थाली से सुहागन महिलाएं एक दूसरे को कुंकुम, हल्दी आैर तिल का टीका लगाती हैं। हल्दी कुंकुम का सिलसिला करीब 15 दिन चलता है।
'सिख मकर संक्रांति को माघी कहते हैं। इस दिन उन 40 सिखों के सम्मान में सिख गुरुद्वारे जाते हैं जिन्होंने दसवें गुरू गोविंद सिंह को शाही सेना के हाथों पकड़े जाने से बचाने के लिए अपनी कुर्बानी दी थी। इस दिन यहां खीर जरूर बनती है। हिमाचल प्रदेश आैर हरियाणा में भी माघी की धूम होती है।
बिहार में 14 जनवरी को सकरात मनाई जाती है। इस दिन लोग सुबह सवेरे स्नान के बाद पूजा करते हैं। इसके अगले दिन यहां मकरात मनाई जाती है, जिस दिन खिचड़ी का सेवन किया जाता है। बुंदेलखंड आैर मध्यप्रदेश में भी इस पर्व को सकरात कहा जाता है। गुजरात में यह पर्व दो दिन मनाया जाता है। 14 जनवरी को उत्तरायण आैर 15 जनवरी को वासी उत्तरायण। दोनों दिन पतंग उड़ाई जाती है।
मकर संक्रांति को कर्नाटक में सुग्गी कहा जाता है। इस दिन यहां लोग स्नान के बाद संक्रांति देवी की पूजा करते हैं, जिसमें सफेद तिल खास तौर पर चढ़ाए जाते हैं। पूजा के बाद ये तिल लोग एक दूसरे को भेंट करते हैं। केरल के सबरीमाला में मकर संक्र ांति के दिन मकर ज्योति प्रज्ज्वलित कर मकर विलाकू का आयोजन होता है। यह 40 दिन का अनुष्ठान होता है, जिसके समापन पर भगवान अयप्पा की पूजा की जाती है।
उड़ीसा में मकर संक्रांति को मकर चौला आैर पश्चिम बंगाल में पौष संक्रांति कहा जाता है। असम में यह पर्व बीहू कहलाता है। यहां इस दिन महिलाएं आैर पुरुष नए कपड़े पहन कर पूजा करते हैं आैर ईश्वर से धनधान्य से परिपूर्णता का आशीर्वाद मांगते हैं। गोवा में इस दिन वर्षा के लिए इंद्र देवता की पूजा की जाती है ताकि फसल अच्छी हो। आंध्र प्रदेश में भी यह पर्व चार दिन मनाया जाता है। पहले दिन 'भोगी" दूसरे दिन 'पेड्डा पांडुगा" (मकर संक्रांति) तीसरे दिन कनुमा आैर चौथे दिन मुक्कानुमा मनाया जाता है। भोगी के दिन घर का पुराना आैर अनुपयोगी सामान निकाला जाता है आैर शाम को उसे जलाया जाता है
थाई माह की शुरुआत
तमिलनाडु में यह पर्व पोंगल कहलाता है। इस दिन से तमिलों के थाई माह की शुरुआत होती है। इस दिन तमिल सूर्य की पूजा करते हैं। उनसे अच्छी फसल के लिए आशीर्वाद मांगते हैं। यह पर्व राज्य में चार दिन मनाया जाता है।
संक्रांति संस्कृत का शब्द है, जो सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश बताता है। भारत में मनाए जाने वाले पर्वों में यह एकमात्र ऐसा पर्व है, जो सौर कैलेंडर पर आधारित है। इसकी वजह से यह पर्व हर साल 14 जनवरी को हर मनाया जाता है। शेष सभी पर्व चंद्र कैलेंडर पर आधारित होते हैं।
वैज्ञानिक फैक्टर : हिंदू ज्योतिष के अनुसार, कुल बारह राशियां होती हैं। इस प्रकार संक्रांति भी 12 हुईं। लेकिन मकर संक्रांति तब मनाई जाती है, जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। देश में मनाए जाने वाले अन्य पर्वों की तारीख बदलती रहती है, क्योंकि वह चंद्र कैलेंडर पर आधारित होते हैं आैर चंद्रमा की गति सूर्य की तुलना में अधिक होती है। दरअसल, पृथ्वी को कर्क आैर मकर रेखाएं काटती हैं। जब सूर्य कर्क रेखा को पार करता है तो पृथ्वी के आबादी वाले हिस्से में उसका प्रकाश कम आता है। इसी दौरान धनु में सूर्य का संचार होने पर सर्दी अधिक हाती है, जबकि मकर में सूर्य का संचार होने पर सर्दी कम होने लगती है। मकर संक्राति से गर्मी तेज होने लगती है। उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद, वाराणसी आैर हरिद्वार में गंगा के घाटों पर तड़के ही श्रद्धालु पहुंच कर स्नान करते हैं। उत्तराखंड में इस पर्व की खास धूम होती है। इस दिन गुड़, आटे आैर घी के पकवान पकाए जाते हैं आैर इनका कुछ हिस्सा पक्षियों के लिए रखा जाता है।
मकर संक्रांति भारत के अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस पर्व को 'तिलगुल" कहा जाता है। महाराष्ट्र में इस पर्व पर घर के लोग सुबह पानी में तिल के कुछ दाने डाल कर नहाते हैं। महिलाएं रंगोली सजाती हैं आैर पूजा की जाती है। पूजा की थाली में तिल जरूर रखा जाता है। इसी थाली से सुहागन महिलाएं एक दूसरे को कुंकुम, हल्दी आैर तिल का टीका लगाती हैं। हल्दी कुंकुम का सिलसिला करीब 15 दिन चलता है।
'सिख मकर संक्रांति को माघी कहते हैं। इस दिन उन 40 सिखों के सम्मान में सिख गुरुद्वारे जाते हैं जिन्होंने दसवें गुरू गोविंद सिंह को शाही सेना के हाथों पकड़े जाने से बचाने के लिए अपनी कुर्बानी दी थी। इस दिन यहां खीर जरूर बनती है। हिमाचल प्रदेश आैर हरियाणा में भी माघी की धूम होती है।
बिहार में 14 जनवरी को सकरात मनाई जाती है। इस दिन लोग सुबह सवेरे स्नान के बाद पूजा करते हैं। इसके अगले दिन यहां मकरात मनाई जाती है, जिस दिन खिचड़ी का सेवन किया जाता है। बुंदेलखंड आैर मध्यप्रदेश में भी इस पर्व को सकरात कहा जाता है। गुजरात में यह पर्व दो दिन मनाया जाता है। 14 जनवरी को उत्तरायण आैर 15 जनवरी को वासी उत्तरायण। दोनों दिन पतंग उड़ाई जाती है।
मकर संक्रांति को कर्नाटक में सुग्गी कहा जाता है। इस दिन यहां लोग स्नान के बाद संक्रांति देवी की पूजा करते हैं, जिसमें सफेद तिल खास तौर पर चढ़ाए जाते हैं। पूजा के बाद ये तिल लोग एक दूसरे को भेंट करते हैं। केरल के सबरीमाला में मकर संक्र ांति के दिन मकर ज्योति प्रज्ज्वलित कर मकर विलाकू का आयोजन होता है। यह 40 दिन का अनुष्ठान होता है, जिसके समापन पर भगवान अयप्पा की पूजा की जाती है।
थाई माह की शुरुआत
तमिलनाडु में यह पर्व पोंगल कहलाता है। इस दिन से तमिलों के थाई माह की शुरुआत होती है। इस दिन तमिल सूर्य की पूजा करते हैं। उनसे अच्छी फसल के लिए आशीर्वाद मांगते हैं। यह पर्व राज्य में चार दिन मनाया जाता है।
गुरुवार, जनवरी 06, 2011
आंध्रप्रदेश : तनाव की चपेट में
दक्षिणी राज्य आंध्रप्रदेश में अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर गठित श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी गई है.
श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट
-आंध्रप्रदेश को ज्यों का त्यों एक संगठित राज्य रखा जाए.
-सीमांध्रा और तेलंगाना में विभाजित किया जाए और हैदराबाद को केंद्र प्रशासित बनाया जाए.
-रायल तेलंगाना और तटीय आंध्र क्षेत्र में विभाजन किया जाए, जिसमें हैदराबाद, रायल तेलंगाना का हिस्सा हो.
-सीमांध्रा और तेलंगाना में विभाजित किया जाए जिसमें हैदराबाद महानगर को एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाए. इस केंद्र शासित प्रदेश में तीन ज़िलों रंगा रेड्डी, महबूबनगर और नलगोंडा को शामिल किया जाए.
-सीमांध्रा और तेलंगाना की मौजूदा सीमाओं को बरकरार रखते हुए विभाजित किया जाए, जिसमें हैदराबाद तेलंगाना की राजधानी हो और सीमांध्रा की नई राजधानी बनाई जाए.
-राज्य को एक रखा जाए, साथ ही तेलंगाना क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास और राजनैतिक सशक्तिकरण के लिए कुछ संवैधानिक और वैधानिक क़दम उठाए जाएं और तेलंगाना क्षेत्रीय काउंसिल का गठन किया जाए.
आंध्रप्रदेश इस समय आशा और आशंका की मिली जुली भावनाओं और तनाव की चपेट में है. प्रदेश का बँटवारा करके अलग तेलंगाना राज्य बनाने की मांग पर विचार के लिए बनाई गई श्रीकृष्ण समिति ने जब अपनी रिपोर्ट केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम को सौंपी तो राज्य दम साधे ये प्रतीक्षा कर रहा था कि इस पर किस तरह की प्रतिक्रिया सामने आएगी. क्योंकि इस समिति की रिपोर्ट का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया है और कोई यह नहीं जानता की समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा क्या है, कोई भी अभी इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता.
श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट
-आंध्रप्रदेश को ज्यों का त्यों एक संगठित राज्य रखा जाए.
-सीमांध्रा और तेलंगाना में विभाजित किया जाए और हैदराबाद को केंद्र प्रशासित बनाया जाए.
-रायल तेलंगाना और तटीय आंध्र क्षेत्र में विभाजन किया जाए, जिसमें हैदराबाद, रायल तेलंगाना का हिस्सा हो.
-सीमांध्रा और तेलंगाना में विभाजित किया जाए जिसमें हैदराबाद महानगर को एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाए. इस केंद्र शासित प्रदेश में तीन ज़िलों रंगा रेड्डी, महबूबनगर और नलगोंडा को शामिल किया जाए.
-सीमांध्रा और तेलंगाना की मौजूदा सीमाओं को बरकरार रखते हुए विभाजित किया जाए, जिसमें हैदराबाद तेलंगाना की राजधानी हो और सीमांध्रा की नई राजधानी बनाई जाए.
-राज्य को एक रखा जाए, साथ ही तेलंगाना क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास और राजनैतिक सशक्तिकरण के लिए कुछ संवैधानिक और वैधानिक क़दम उठाए जाएं और तेलंगाना क्षेत्रीय काउंसिल का गठन किया जाए.
आंध्रप्रदेश इस समय आशा और आशंका की मिली जुली भावनाओं और तनाव की चपेट में है. प्रदेश का बँटवारा करके अलग तेलंगाना राज्य बनाने की मांग पर विचार के लिए बनाई गई श्रीकृष्ण समिति ने जब अपनी रिपोर्ट केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम को सौंपी तो राज्य दम साधे ये प्रतीक्षा कर रहा था कि इस पर किस तरह की प्रतिक्रिया सामने आएगी. क्योंकि इस समिति की रिपोर्ट का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया है और कोई यह नहीं जानता की समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा क्या है, कोई भी अभी इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता.
बुधवार, जनवरी 05, 2011
आहत मीरा
सदन के सुचारू संचालन के लिए लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार गुजरे वर्ष के तीनों सत्रों में सदस्यों से बार-बार अपील करती रहीं, लेकिन सांसदों के कानों पर जूं नहीं रेंगी। संसद में व्यवधान तथा जबरन स्थगन के चलते न केवल 269 घंटे का समय व्यर्थ गवांया गया, बल्कि अरबों रुपए की करदाताओं की गाढ़ी कमाई को भी स्वाहा कर दिया...
रविवार, जनवरी 02, 2011
2010 : संसद का लेखाजोखा
सालभर आहत रहीं मीरा
सदन के सुचारू संचालन के लिए लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार गुजरे वर्ष के तीनों सत्रों में सदस्यों से बार-बार अपील करती रहीं, लेकिन सांसदों के कानों पर जूं नहीं रेंगी। संसद में व्यवधान तथा जबरन स्थगन के चलते न केवल 269 घंटे का समय व्यर्थ गवांया गया, बल्कि अरबों रुपए की करदाताओं की गाढ़ी कमाई को भी स्वाहा कर दिया। संसद के बजट सत्र, मानसू़त्र सत्र आैर शीतकालीन सत्र को मिलाकर वर्ष भर में कुल 80 बैठकें हुई। इनमें से व्यवधान आैर स्थगन के चलते 27 दिन कोई कामकाज नहीं हुआ। इस प्रकार लोकसभा ने 33 फीसदी यानी करीब एक तिहाई समय बर्बाद कर दिया।
बजट सत्र : बजट सत्र में लोकसभा की 32 बैठकें हुई, जिनकी कुल अवधि 137 घंटे तथा 51 मिनट थी। सरकार ने 27 विधेयक पेश किए आैर 21 विधेयक पारित किए गए, लेकिन बजट सत्र के दूसरे चरण में 17 दिन में से केवल नौ दिन ही प्रश्नकाल हो सका। शुरुआत से ही सदस्यों से सदन को सुचारू रूप से चलाने की बार-बार अपील करने वाली स्पीकर मीरा कुमार ने इस बात पर बेहद चिंता जताई थी कि लगातार व्यवधान के चलते प्रश्नकाल प्रभावित हुआ है। उन्होंने बेहद आहत स्वर में कहा था कि इस प्रकार का व्यवधान संसद जैसी महत्वपूर्ण संस्था को अप्रासंगिक बना देगा।
मानसून सत्र : 26 जुलाई से शुरू होकर 31 अगस्त तक चले संसद के मानसून सत्र में भी कामकाज की कमोबेश यही स्थिति रही। 136 घंटे तथा 10 मिनट की समयावधि में सिमटी लोकसभा की 26 बैठकों में से 11 दिन प्रश्नकाल बाधित हुआ। सूचीबद्ध 460 तारांकित सवालों में से केवल 46 सवालों के ही सदन में जवाब दिए जा सके। इस प्रकार मौखिक प्रश्नों का आैसत बजट सत्र में 2.37 सवाल प्रतिदिन से आैर नीचे गिरकर 1.91 पर पहुंच गया। मानसून सत्र में महंगाई, पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि, कॉमनवेल्थ गेम्स आैर अवैध खनन को लेकर विपक्ष ने भारी हंगामा किया। इस सत्र में भी स्पीकर ने यहां तक कहा, 'राजनीतिक दलों आैर सदस्यों को निजी तौर पर संसदीय लोकतंत्र को हो रही इस क्षति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। हम यहां अनगिनत देशभक्त भारतीयों के बलिदानों की बदौलत बैठे हैं। मैं सभी संंबंधित पक्षों से अपील करती हूं कि सदन की गरिमा की रक्षा करें।" लेकिन बजट सत्र आैर मानसून सत्र में की गई स्पीकर की इन अपीलों का सदस्यों पर कोई असर नहीं हुआ।
शीतकालीन सत्र : 2 जी स्पैक्ट्रम पर बना गतिरोध सत्र की समाप्ति तक बरकरार रहा। इस पर हुए हंगामे के कारण करदाताओं की करीब डेढ़ अरब रुपए रही की गाढ़ी कमाई पर पानी फिर गया। 2 जी स्पैक्ट्रम, आदर्श हाउसिंग सोसायटी आैर कॉमनवेल्थ गेम्स के घोटालों के मामलों की संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराने पर अड़े विपक्ष के हंगामे के कारण नौ नवम्बर से शुरू हुए शीतकालीन सत्र में कोई खास कामकाज नहंी हुआ।
बैठकें स्थगित, गाढ़ी कमाई स्वाहा
-एक सत्र की एक दिन की कार्रवाई पर 7.65 करोड़ रुपए का खर्च
-संसद के बजट सत्र, मानसू़त्र सत्र आैर शीतकालीन सत्र को मिलाकर वर्ष भर में कुल 80 बैठकें हुई।
-इनमें से व्यवधान आैर स्थगन के चलते 27 दिन कोई कामकाज नहीं हुआ। लोकसभा में 33 फीसद समय व्यर्थ
-2010 : लोकसभा में 33 फीसदी यानी करीब एक तिहाई समय बर्बाद हुआ
-बजट सत्र : 69 घंटे आैर 51 मिनट का समय गंवाया
-मानसून सत्र : 45 घंटों के अमूल्य समय पर पानी फिर गया।
-शीतकालीन सत्र : 23 दिन में से 22 दिन की कार्यवाही ही नहीं हुई।
-पूरे सत्र में 620 तारांकित प्रश्न सूचीबद्ध थे, लेकिन केवल 76 सवालों का ही मंत्री प्रश्नकाल में जवाब दे पाए। कुछ खास
-इस प्रकार आैसतन प्रतिदिन 2.37 सवालों को ही प्रश्नकाल में लिया गया।
सदन के सुचारू संचालन के लिए लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार गुजरे वर्ष के तीनों सत्रों में सदस्यों से बार-बार अपील करती रहीं, लेकिन सांसदों के कानों पर जूं नहीं रेंगी। संसद में व्यवधान तथा जबरन स्थगन के चलते न केवल 269 घंटे का समय व्यर्थ गवांया गया, बल्कि अरबों रुपए की करदाताओं की गाढ़ी कमाई को भी स्वाहा कर दिया। संसद के बजट सत्र, मानसू़त्र सत्र आैर शीतकालीन सत्र को मिलाकर वर्ष भर में कुल 80 बैठकें हुई। इनमें से व्यवधान आैर स्थगन के चलते 27 दिन कोई कामकाज नहीं हुआ। इस प्रकार लोकसभा ने 33 फीसदी यानी करीब एक तिहाई समय बर्बाद कर दिया।
बजट सत्र : बजट सत्र में लोकसभा की 32 बैठकें हुई, जिनकी कुल अवधि 137 घंटे तथा 51 मिनट थी। सरकार ने 27 विधेयक पेश किए आैर 21 विधेयक पारित किए गए, लेकिन बजट सत्र के दूसरे चरण में 17 दिन में से केवल नौ दिन ही प्रश्नकाल हो सका। शुरुआत से ही सदस्यों से सदन को सुचारू रूप से चलाने की बार-बार अपील करने वाली स्पीकर मीरा कुमार ने इस बात पर बेहद चिंता जताई थी कि लगातार व्यवधान के चलते प्रश्नकाल प्रभावित हुआ है। उन्होंने बेहद आहत स्वर में कहा था कि इस प्रकार का व्यवधान संसद जैसी महत्वपूर्ण संस्था को अप्रासंगिक बना देगा।
मानसून सत्र : 26 जुलाई से शुरू होकर 31 अगस्त तक चले संसद के मानसून सत्र में भी कामकाज की कमोबेश यही स्थिति रही। 136 घंटे तथा 10 मिनट की समयावधि में सिमटी लोकसभा की 26 बैठकों में से 11 दिन प्रश्नकाल बाधित हुआ। सूचीबद्ध 460 तारांकित सवालों में से केवल 46 सवालों के ही सदन में जवाब दिए जा सके। इस प्रकार मौखिक प्रश्नों का आैसत बजट सत्र में 2.37 सवाल प्रतिदिन से आैर नीचे गिरकर 1.91 पर पहुंच गया। मानसून सत्र में महंगाई, पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि, कॉमनवेल्थ गेम्स आैर अवैध खनन को लेकर विपक्ष ने भारी हंगामा किया। इस सत्र में भी स्पीकर ने यहां तक कहा, 'राजनीतिक दलों आैर सदस्यों को निजी तौर पर संसदीय लोकतंत्र को हो रही इस क्षति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। हम यहां अनगिनत देशभक्त भारतीयों के बलिदानों की बदौलत बैठे हैं। मैं सभी संंबंधित पक्षों से अपील करती हूं कि सदन की गरिमा की रक्षा करें।" लेकिन बजट सत्र आैर मानसून सत्र में की गई स्पीकर की इन अपीलों का सदस्यों पर कोई असर नहीं हुआ।
शीतकालीन सत्र : 2 जी स्पैक्ट्रम पर बना गतिरोध सत्र की समाप्ति तक बरकरार रहा। इस पर हुए हंगामे के कारण करदाताओं की करीब डेढ़ अरब रुपए रही की गाढ़ी कमाई पर पानी फिर गया। 2 जी स्पैक्ट्रम, आदर्श हाउसिंग सोसायटी आैर कॉमनवेल्थ गेम्स के घोटालों के मामलों की संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराने पर अड़े विपक्ष के हंगामे के कारण नौ नवम्बर से शुरू हुए शीतकालीन सत्र में कोई खास कामकाज नहंी हुआ।
बैठकें स्थगित, गाढ़ी कमाई स्वाहा
-एक सत्र की एक दिन की कार्रवाई पर 7.65 करोड़ रुपए का खर्च
-संसद के बजट सत्र, मानसू़त्र सत्र आैर शीतकालीन सत्र को मिलाकर वर्ष भर में कुल 80 बैठकें हुई।
-इनमें से व्यवधान आैर स्थगन के चलते 27 दिन कोई कामकाज नहीं हुआ। लोकसभा में 33 फीसद समय व्यर्थ
-2010 : लोकसभा में 33 फीसदी यानी करीब एक तिहाई समय बर्बाद हुआ
-बजट सत्र : 69 घंटे आैर 51 मिनट का समय गंवाया
-मानसून सत्र : 45 घंटों के अमूल्य समय पर पानी फिर गया।
-शीतकालीन सत्र : 23 दिन में से 22 दिन की कार्यवाही ही नहीं हुई।
-पूरे सत्र में 620 तारांकित प्रश्न सूचीबद्ध थे, लेकिन केवल 76 सवालों का ही मंत्री प्रश्नकाल में जवाब दे पाए। कुछ खास
-इस प्रकार आैसतन प्रतिदिन 2.37 सवालों को ही प्रश्नकाल में लिया गया।
शुक्रवार, दिसंबर 31, 2010
2011 होगा शताब्दी का अनूठा वर्ष
नव वर्ष 2011 इस दृष्टि से शताब्दी का अनूठा वर्ष है कि इसके एक दिन की तिथि, माह तथा वर्ष की संख्याओं से एक के अंक का छक्का लगता है।
यह तिथि है 11 नवम्बर, 2011 जब तिथि माह एवं वर्ष को 11-11-11 के रूप में दर्शाया जाएगा। ऐसी स्थिति शताब्दी में केवल एक बार आती है। इस वर्ष के कुल चार दिनों की तिथि-माह तथा वर्ष सभी में केवल एक का अंक रहेगा। इसकी शुरुआत वर्ष के पहले दिन एक जनवरी 1-1-11 से हो रही है। एक के अंक के छह बार आने की युति पिछली बार 1911 की इसी तिथि को थी आैर अगली बार सन 2111 में होगी। अत: इसे शताब्दी युति कहा जा सकता है।
इससे पहले चार युतियों के मामले में 2001 में भी स्थिति 2011 के निकट थी, किन्तु अंतर यह था कि तब चारो युतियों में एक के अंक की आवृत्ति 2011 के मुकाबले एक एक कम थी। यानी 11 नवम्बर को अधिकतम आवृति पांच ही थी 11-11-1 अगली बार दो फरवरी 2022 को तिथि, माह एवं वर्ष को 2-2-22 के रूप में दर्शाया जाएगा। वर्ष 2022 में दो की संख्या की अधिकतम पांच आवृत्तियां 22 फरवरी 22-2-22 को होगी। उस वर्ष केवल एक ही संख्या यानी दो से बनने वाली तिथि, माह एवं वर्ष की युति केवल इन्हीं दो दिनों में देखने को मिलेगी। इस प्रकार केवल एक संख्या से चार बार उपर्युक्त युतियां 2001 के बाद 2011 में ही बन रही है, जबकि अधिकतम छह बार उसी संख्या यानी एक की आवृत्ति होना तो 2011 को शताब्दी का अनूठा वर्ष ही बना देता है।
इस पूरी शताब्दी में एक ही अंक की आवृत्तियों से बनने वाली ऐसी युतियां इस प्रकार है-
तिथि युति
2011
2022
यह तिथि है 11 नवम्बर, 2011 जब तिथि माह एवं वर्ष को 11-11-11 के रूप में दर्शाया जाएगा। ऐसी स्थिति शताब्दी में केवल एक बार आती है। इस वर्ष के कुल चार दिनों की तिथि-माह तथा वर्ष सभी में केवल एक का अंक रहेगा। इसकी शुरुआत वर्ष के पहले दिन एक जनवरी 1-1-11 से हो रही है। एक के अंक के छह बार आने की युति पिछली बार 1911 की इसी तिथि को थी आैर अगली बार सन 2111 में होगी। अत: इसे शताब्दी युति कहा जा सकता है।
इससे पहले चार युतियों के मामले में 2001 में भी स्थिति 2011 के निकट थी, किन्तु अंतर यह था कि तब चारो युतियों में एक के अंक की आवृत्ति 2011 के मुकाबले एक एक कम थी। यानी 11 नवम्बर को अधिकतम आवृति पांच ही थी 11-11-1 अगली बार दो फरवरी 2022 को तिथि, माह एवं वर्ष को 2-2-22 के रूप में दर्शाया जाएगा। वर्ष 2022 में दो की संख्या की अधिकतम पांच आवृत्तियां 22 फरवरी 22-2-22 को होगी। उस वर्ष केवल एक ही संख्या यानी दो से बनने वाली तिथि, माह एवं वर्ष की युति केवल इन्हीं दो दिनों में देखने को मिलेगी। इस प्रकार केवल एक संख्या से चार बार उपर्युक्त युतियां 2001 के बाद 2011 में ही बन रही है, जबकि अधिकतम छह बार उसी संख्या यानी एक की आवृत्ति होना तो 2011 को शताब्दी का अनूठा वर्ष ही बना देता है।
इस पूरी शताब्दी में एक ही अंक की आवृत्तियों से बनने वाली ऐसी युतियां इस प्रकार है-
तिथि युति
- -1 जनवरी, 2001 1-1-1
- -11 जनवरी, 2001 11-1-1
- -1 नवम्बर, 2001 1-11-1
- -11नवम्बर, 2001 11-11-1
- -2 फरवरी, 2002 2-2-2
- -22 फरवरी, 2002 22-2-2
- -3 मार्च, 2003 3-3-3
- -4 अप्रैल, 2004 4-4-4
- -5 मई, 2005 5-5-5
- -6 जून, 2006 6-6-6
- -7 जुलाई, 2007 7-7-7
- -8 अगस्त, 2008 8-8-8
- -9 सितम्बर, 2009 9-9-9
2011
- -1 जनवरी, 2011 1-1-11
- -11 जनवरी, 2011 11-1-11
- -1 नवम्बर, 2011 1-11-11
- -11 नवम्बर, 2011 11-11-11
2022
- -2 फरवरी, 2022 2-2-22
- -22 फरवरी, 2022 22-2-22
- -3 मार्च 2033 3-3-33
- -4 अप्रैल, 2044 4-4-44
- -5 मई, 2055 5-5-55
- -6 जून, 2066 6-6-66
- -7 जुलाई, 2077 7-7-77
- -8 अगस्त 2088 8-8-88
- -9 सितम्बर, 2099 9-9-99
शनिवार, दिसंबर 25, 2010
2010 : कुछ उजले, कुछ स्याह अक्स
2010 : कुछ उजले, कुछ स्याह अक्स
वेधशाला ने बढ़ाया नाम : राजस्थान के जयपुर में 18वीं सदी में निर्मित खगोलीय वेधशाला को यूनेस्को ने इस साल विश्व विरासत स्थल का दर्जा दे दिया।
वेधशाला का निर्माण महाराजा जयसिंह द्वितीय ने वर्ष 1727 से वर्ष 1734 के दौरान कराया था।
मैसूर भी रहा सुर्खियों में : 'महलों के शहर" के नाम से मशहूर मैसूर को न्यूयार्क टाइम्स ने इस साल घूमने के लिए 31 सबसे अच्छे शहरों की सूची में चौथे पायदान पर रखा। इस सूची में 13 वें स्थान पर मुंबई है।
बेहतर रहा आईआईएम बेंगलुरू : फ्र ंस के वार्षिक सर्वेक्षण में भारतीय प्रबंधन संस्थान बेंगलुरू (आईआईएम-बी) को विश्व के शीर्ष 25 बिजनेस स्कूलों में शुमार किया गया। इसे 24वें पायदान पर रखा गया है। आईआईएम अहमदाबाद को 55वें पायदान पर रखा गया है।
विधायकपुरी थाना श्रेष्ठ : विश्व में सार्वजनिक सुरक्षा, न्याय आैर मानवाधिकार क्षेत्र में काम करने वाली न्यूयार्क की संस्था एटलस ग्लोबल एलियांस ने गुलाबी नगरी जयपुर के विधायकपुरी थाने को इस साल एशिया का सर्वश्रेष्ठ पुलिस थाना चुना है।
धूम्रपान निषेध की उजली तस्वीर : ब्रिाटेन के एक सर्वेक्षण के हवाले से लिखा है कि मदिरापान में ब्रिाटेन के लोग सबसे आगे हैं, जबकि भारतीय सबसे कम शराब पीते हैं। इनमें 27 प्रतिशत लोग तो ऐसे हैं, जिन्होंने शायद ही कभी शराब को हाथ लगाया हो।
महिलाओं की हालत में बेहतर सुधार : सेंटर फॉर वर्क लाइफ पालिसी की दिसम्बर में जारी रिपोर्ट 'बैटल ऑफ फीमेल टैलेंट इन इंडिया" मंे कहा गया है कि 80 प्रतिशत भारतीय महिलाएं अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए हर समय कुछ नया कर गुजरने को तैयार रहती हैं। अमेरिकी महिलाओं के लिए यह आंकड़ा 52 प्रतिशत है।
धंुधले अक्स
रिश्वत देने में नंबर वन : बर्लिन की गैर सरकारी एजेंसी ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (टीआई) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2010 में सबसे ज्यादा रिश्वत अफगानिस्तान, कंबोडिया, कैमरून, भारत, इराक, लाइबेरिया, नाइजीरिया, फलस्तीन, सेनेगल, सियरा लियोन आैर युगांडा में दी गई। भारत में 54 फीसदी लोगों ने अपने कार्यों के लिए रिश्वत दी।
भ्रष्टाचार आैर रिश्वतखोरी जैसे आरोपों के बीच देशवासियों के लिए इस वर्ष कुछ खबरें राहत देने वाली भी रहीं हैं। मसलन भारत में शराब पीने वालों की तादाद दुनिया के कई देशों से काफी कम आंकी गई। बेंगलुरू का आईआईएम विश्व के शीर्ष 25 प्रबंधन संस्थानों में शामिल किया गया। जयपुर के एक थाने को एशिया का सर्वश्रेष्ठ थाना करार दिया गया। जाते बरस में भारत इसी तरह के अच्छे बुरे कई कारणों से खबरों में रहा है।
उजले अक्सवेधशाला ने बढ़ाया नाम : राजस्थान के जयपुर में 18वीं सदी में निर्मित खगोलीय वेधशाला को यूनेस्को ने इस साल विश्व विरासत स्थल का दर्जा दे दिया।
वेधशाला का निर्माण महाराजा जयसिंह द्वितीय ने वर्ष 1727 से वर्ष 1734 के दौरान कराया था।
मैसूर भी रहा सुर्खियों में : 'महलों के शहर" के नाम से मशहूर मैसूर को न्यूयार्क टाइम्स ने इस साल घूमने के लिए 31 सबसे अच्छे शहरों की सूची में चौथे पायदान पर रखा। इस सूची में 13 वें स्थान पर मुंबई है।
बेहतर रहा आईआईएम बेंगलुरू : फ्र ंस के वार्षिक सर्वेक्षण में भारतीय प्रबंधन संस्थान बेंगलुरू (आईआईएम-बी) को विश्व के शीर्ष 25 बिजनेस स्कूलों में शुमार किया गया। इसे 24वें पायदान पर रखा गया है। आईआईएम अहमदाबाद को 55वें पायदान पर रखा गया है।
विधायकपुरी थाना श्रेष्ठ : विश्व में सार्वजनिक सुरक्षा, न्याय आैर मानवाधिकार क्षेत्र में काम करने वाली न्यूयार्क की संस्था एटलस ग्लोबल एलियांस ने गुलाबी नगरी जयपुर के विधायकपुरी थाने को इस साल एशिया का सर्वश्रेष्ठ पुलिस थाना चुना है।
धूम्रपान निषेध की उजली तस्वीर : ब्रिाटेन के एक सर्वेक्षण के हवाले से लिखा है कि मदिरापान में ब्रिाटेन के लोग सबसे आगे हैं, जबकि भारतीय सबसे कम शराब पीते हैं। इनमें 27 प्रतिशत लोग तो ऐसे हैं, जिन्होंने शायद ही कभी शराब को हाथ लगाया हो।
महिलाओं की हालत में बेहतर सुधार : सेंटर फॉर वर्क लाइफ पालिसी की दिसम्बर में जारी रिपोर्ट 'बैटल ऑफ फीमेल टैलेंट इन इंडिया" मंे कहा गया है कि 80 प्रतिशत भारतीय महिलाएं अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए हर समय कुछ नया कर गुजरने को तैयार रहती हैं। अमेरिकी महिलाओं के लिए यह आंकड़ा 52 प्रतिशत है।
धंुधले अक्स
रिश्वत देने में नंबर वन : बर्लिन की गैर सरकारी एजेंसी ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (टीआई) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2010 में सबसे ज्यादा रिश्वत अफगानिस्तान, कंबोडिया, कैमरून, भारत, इराक, लाइबेरिया, नाइजीरिया, फलस्तीन, सेनेगल, सियरा लियोन आैर युगांडा में दी गई। भारत में 54 फीसदी लोगों ने अपने कार्यों के लिए रिश्वत दी।
'डर्टी डॉजन" में दूसरे स्थान पर भारत : कंप्यूटर सुरक्षा कंपनी सोफोस ने 29 अप्रैल को अपनी रिपोर्ट में बताया कि भारत दुनिया भर में स्पैम या जंक मेल भेजने वाले 'डर्टी डॉजन" में दूसरे स्थान पर है। 'पांडा लैब्स" के एक अध्ययन के मुताबिक, दुनिया भर में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों के पास जो 'स्पैम" यानी अवांछित ई-मेल आते हैं उनमें दूसरी सबसे ज्यादा हिस्सेदारी भारत की होती है।
भारतीय संसद : हंगामे का नया इतिहास
पिछले कई सालों की तरह इस साल भी संसद के सत्रों में हंगामा, व्यवधान स्थगन का सिलसिला जारी रहा, लेकिन इस महीने 13 तारीख को संपन्न शीतकालीन सत्र का पहला दिन छोड़ कर पूरा की पूरा हंगामे की भेंट चढ़ जाने से भारतीय संसद का एक नया इतिहास लिखा गया।
-आंकड़ें बताते हैं कि शीतकालीन सत्र 1985 में आठवीं लोकसभा से संपन्न पिछले 82 सत्रों में पहला ऐसा सत्र था जिसमें संसद के निचले सदन लोकसभा ने 22 बैठकों के उपलब्ध समय में से मात्र सात घंटे 37 मिनट यानी 5.5 फीसदी आैर राज्यसभा ने मात्र दो घंटे 44 मिनट यानी 2.4 फीसदी समय का ही उपयोग किया, जबकि बाकी का सारा समय 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले पर संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की विपक्ष की मांग के हंगामे की भेंट चढ़ गया।-इस पूरे साल संसद का अधिकांश कामकाजी समय हंगामे की भेंट चढ़ा तो वहीं सांसदों द्वारा खुद अपने वेतन भत्ते बढाने संबंधी विवादास्पद विधेयक को पारित किए जाने की भी मीडिया में काफी चर्चा रही।
- इस वर्ष राज्यसभा द्वारा महिला आरक्षण संबंधी विधेयक को पारित किया जाना एक बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है। हालांकि लोकसभा में पारित नहीं हो सकने के कारण यह लागू नहीं हो सका।
-संसदीय कामकाज के लिहाज से वर्ष की शुरुआत ही काफी निराशाजनक रही। 22 फरवरी से शुरू होकर सात मई तक चले बजट सत्र में मात्र तीन मंत्रालयों की अनुदानों की अनुपूरक मांगों पर चर्चा की गई, जबकि बाकी सभी मंत्रालयों की अनुदान की अनुपूरक मांगों तथा अन्य विधायी कामकाज को गिलोटिन के जरिए निपटाया गया।
- संसद के दोनों सदनों में बजट सत्र में सरकार ने 27 विधेयकों को पारित कराने की योजना बनाई थी, लेकिन मात्र छह विधेयकों को ही पारित किया जा सका। बजट सत्र में लोकसभा में 12 विधेयक पारित किए गए। इसमें से पांच विधेयकोें पर 15 मिनट से भी कम समय की चर्चा कराई गई। इनके अलावा, 31 अगस्त को समाप्त हुए संसद के मानसून सत्र में सांसदों के वेतन वृद्धि आैर परमाणु दायित्व विधेयक पारित किए गए। दोनों ही विधेयक काफी चर्चित रहे।
- इस सत्र में सरकार ने दोनों ही सदनों में 35 विधेयक पेश करने की योजना बनाई थी लेकिन 23 विधेयक ही पेश किए जा सके। 33 विधेयकों को पारित कराने की योजना के स्थान पर केवल 21 विधेयकों को पारित किया गया। भारतीय संसद के इतिहास में यह अब तक का सबसे लंबा गतिरोध था।
- 1987 में बोफोर्स मामले में जेपीसी की मांग पर संसद में 45 दिन हंगामा हुआ था, लेकिन तब भी इस बार की तरह संसद का कामकाज पूरी तरह ठप नहीं हुआ था। संसद के इस सत्र के दौरान कायम रहे गतिरोध पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी गहरी चिंता जताते हुए कहा था कि उन्हें संसदीय प्रणाली के भविष्य को लेकर ही चिंता हो रही है।
सोमवार, अक्टूबर 04, 2010
दिल्ली : द बेस्ट
04 अक्टूबर: विश्व पर्यावास दिवस पर विशेष
सीआईआई आैर इंस्टीट्यूट ऑफ कम्पीटेटिवनेस इंडिया के इस सूचकांक के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली रहने की दृष्टि से देश के अन्य महानगरों आैर नगरों की तुलना में शीर्ष पर है। दिल्ली के बाद क्रमश: मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरू, कोलकाता, हैदराबाद आैर अहमदाबाद का स्थान हैं।
सूचकांक के अनुसार सामाजिक राजनीतिक माहौल की दृष्टि से मुंबई सबसे ऊपर है। उसके बाद क्रमश: दिल्ली, कोलकाता, गोवा आैर चेन्नई का स्थान आता है। शिक्षा एवं आर्थिक माहौल की दृष्टि से भी दिल्ली सबसे आगे है, जबकि भुवनेश्वर, गुवाहाटी, जयपुर, कानपुर, लखनऊ, पटना आैर वड़ोदरा इस मोर्चे पर सबसे पीछे हैं।
इस वर्ष विश्व पर्यावास दिवस का ध्येय वाक्य 'बेहतर शहर, बेहतर जनजीवन" है। निवास योग्य सूचकांक 2010 के अनुसार जनसांख्यिकी, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा, सुरक्षा, आवास, सामाजिक एवं सास्कृतिक राजनीतिक माहौल, आर्थिक विकास, प्राकृतिक एवं नियोजित पर्यावरण जैसे आठ मानकों के आधार पर 37 शहरों की सूची में दिल्ली शीर्ष पर है।
सघन आबादी वाली इस दिल्ली में प्रति किलोमीटर क्षेत्र में करीब छह हजार से अधिक लोग (1991 के आंकडे़ के अनुसार) निवास करते हैं। हालांकि दिल्ली का एक चेहरा आैर भी है। यहां बड़ी संख्या में झुग्गी बस्तियां आैर अनधिकृत कॉलोनियां भी हैं, जहां जनजीवन उतना अच्छा नहीं है। इन कॉलोनियांें में बिल्कुल सटे-सटे मकान हैं, सीवर लाइन, पार्क आदि की कमी है।
क्या है पर्यावास दिवस
पर्यावास दिवस हर वर्ष अक्टूबर के पहले सोमवार को मनाया जाता है। यह दिवस शहरों आैर नगरों की स्थिति तथा सभी को मूल अधिकार खासकर पर्याप्त आश्रय पर बल देता है। यह दुनिया को मानव पर्यावास के भविष्य के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी का भी एहसास दिलाता है। यह दिवस सन 1986 से मनाया जा रहा है।
'पर्यावास दिवस हमें वार्षिक अवसर प्रदान करता है कि हम अपने शहरों आैर नगरों को कैसे सभी के लिए बेहतर स्थान बना सकते हैं"
बान की मून (संयुक्त राष्ट्र महासचिव)
सीआईआई आैर इंस्टीट्यूट ऑफ कम्पीटेटिवनेस इंडिया के इस सूचकांक के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली रहने की दृष्टि से देश के अन्य महानगरों आैर नगरों की तुलना में शीर्ष पर है। दिल्ली के बाद क्रमश: मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरू, कोलकाता, हैदराबाद आैर अहमदाबाद का स्थान हैं।
सूचकांक के अनुसार सामाजिक राजनीतिक माहौल की दृष्टि से मुंबई सबसे ऊपर है। उसके बाद क्रमश: दिल्ली, कोलकाता, गोवा आैर चेन्नई का स्थान आता है। शिक्षा एवं आर्थिक माहौल की दृष्टि से भी दिल्ली सबसे आगे है, जबकि भुवनेश्वर, गुवाहाटी, जयपुर, कानपुर, लखनऊ, पटना आैर वड़ोदरा इस मोर्चे पर सबसे पीछे हैं।
इस वर्ष विश्व पर्यावास दिवस का ध्येय वाक्य 'बेहतर शहर, बेहतर जनजीवन" है। निवास योग्य सूचकांक 2010 के अनुसार जनसांख्यिकी, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा, सुरक्षा, आवास, सामाजिक एवं सास्कृतिक राजनीतिक माहौल, आर्थिक विकास, प्राकृतिक एवं नियोजित पर्यावरण जैसे आठ मानकों के आधार पर 37 शहरों की सूची में दिल्ली शीर्ष पर है।
सघन आबादी वाली इस दिल्ली में प्रति किलोमीटर क्षेत्र में करीब छह हजार से अधिक लोग (1991 के आंकडे़ के अनुसार) निवास करते हैं। हालांकि दिल्ली का एक चेहरा आैर भी है। यहां बड़ी संख्या में झुग्गी बस्तियां आैर अनधिकृत कॉलोनियां भी हैं, जहां जनजीवन उतना अच्छा नहीं है। इन कॉलोनियांें में बिल्कुल सटे-सटे मकान हैं, सीवर लाइन, पार्क आदि की कमी है।
क्या है पर्यावास दिवस
पर्यावास दिवस हर वर्ष अक्टूबर के पहले सोमवार को मनाया जाता है। यह दिवस शहरों आैर नगरों की स्थिति तथा सभी को मूल अधिकार खासकर पर्याप्त आश्रय पर बल देता है। यह दुनिया को मानव पर्यावास के भविष्य के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी का भी एहसास दिलाता है। यह दिवस सन 1986 से मनाया जा रहा है।
'पर्यावास दिवस हमें वार्षिक अवसर प्रदान करता है कि हम अपने शहरों आैर नगरों को कैसे सभी के लिए बेहतर स्थान बना सकते हैं"
बान की मून (संयुक्त राष्ट्र महासचिव)
शनिवार, अक्टूबर 02, 2010
बिना घर के गृहमंत्री
जन्मदिवस 02 अक्टूबर पर विशेष
दो अक्टूबर को 1904 को वाराणसी के मुगल सराय कस्बे में एक किसान परिवार में शास्त्री जी का जन्म हुआ। उनके पिता शारदा प्रसाद एक गरीब अध्यापक थे। बाद में उन्होंने इलाहाबाद के राजस्व विभाग में कलर्क के रूप में काम किया। उनकी माता का नाम राम दुलारी था। शास्त्री जी के बचपन का नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था। जब वह एक वर्ष के थे तो उनके पिता का निधन हो गया। उनका आैर उनके भाई-बहनों का पालन-पोषण उनकी मां दुलारी देवी ने किया। उनके दादा हजारीलाल उन्हें प्यार से 'नन्हें" पुकारते थे। लालबहादुर बचपन से ही सच्चे, ईमानदार आैर जिम्मेदार प्रवृत्ति के थे।
एक बार की घटना है, जब वह छह वर्ष के थे तो उनके मित्र एक बाग में फल तोड़ने के लिए उन्हें भी साथ ले गए, जब उनके मित्र फल तोड़ रहे थे तो बगीचे का चौकीदार आ गया। इस पर पेड़ पर चढे़ उनके सभी मित्र भाग गए, लेकिन वह वहीं खडे़ रहे। चौकीदार ने उन्हें पकड लिया। उन्हें पीटने लगा। तब उन्होंने कहा, मुझे मत मारों मैं अनाथ हूं। मैंने कुछ नहीं किया है। मैं झूठ नहीं बोल रहा हूं। मैंने तुम्हारे बाग को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है। इस पर चौकदार ने कहा, मैं जानता हूं कि तुम झूठ नहीं बोल रहे हो, लेकिन तुम्हें अपने व्यवहार में सुधार करना चाहिए। इससे दूसरों को कष्ट न पहुंचे।
रेलवे स्कूल में चौथी कक्षा तक पढ़ाई के बाद शास्त्री ने बनारस के हरिश्चंद हाई स्कूल में शिक्षा आरम्भ की। अपनी पढ़ाई के लिए उन्हें गंगा नदी के पार जाना पड़ता था। एक बार नाव के किराए के लिए पैसे नहीं होने पर शर्मिदंगी से बचने के लिए अपने मित्रों को बिना बताए नाव के जाने के बाद उन्होंने गंगा नदी को तैरकर पार किया। शास्त्री जी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से इतना प्रभावित थे कि वह उनका भाषण सुनने के लिए बनारस से 50 मील दूर गांव तक जा पहुंचे। तिलक के भाषण पर उनके ह्मदय पर गहरा प्रभाव पड़ा।
1915 में महात्मा गांधी का भाषण सुनने के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि वह अपना पूरा जीवन देश की सेवा में लगा देंगे। लाल बहादुर का जुड़ाव शुरू से ही गांधी जी के अहिंसा आंदोलन के साथ रहा आैर वह अंत तक कांग्रेस से जुडे़ रहे। जब वह 17 वर्ष के थे तो गांधी जी के आह्वान 'अंग्रेजों के सरकारी स्कूल कालेजों का बहिष्कार करो" पर उन्होंने स्कूल छोड़ दिया, जबकि उनकी माता आैर संबंधियों ने उन्हें स्कूल न छोड़ने की सलाह दी क्योंकि उनका काशी विद्या पीठ में चौथा वर्ष था। वह विद्यालय नहीं गए। इस विरोध के कारण उन्हें गिरफ्तार करने के बाद चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। 1930 में जब गांधी जी ने 'नमक सत्याग्रह" शुरू किया तो उसमें शास्त्री जी की मुख्य भूमिका रही। वह गांधी जी के स्वातंत्र्य वीरों की सेना के एक महान सेनानायक थे।
1928 में काशी विद्यापीठ से लाल बहादुर को 'शास्त्री" की डिग्री मिली। तब से वह श्रीवास्तव की जगह शास्त्री कह कर पुकारे जाने लगे। वह 1921 में लाला लाजपतराय द्वारा गठित 'पीपुल्स सोसायटी" के सदस्य भी रहे। सोसायटी का उद्देश्य युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रेरित करना था। बाद में उन्हें सोसायटी का अध्यक्ष बनाया गया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा।
1927 में शास्त्री जी का विवाह ललिता देवी से हुआ। उन्हें अपने ससुर से एक चरखा आैर कुछ गज खादी उपहार स्वरूप मिली। शास्त्री को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। उनकी गुरू नानक देव में विशेष रू चि थी। शास्त्री जी को पढ़ने के अलावा क्रिकेट देखने आैर लिखने का भी शौक था। उन्होंने मैडम क्यूरी की जीवनी का हिन्दी में अनुवाद भी किया आैर कई यूरोपीय लेखकों की दार्शनिक आैर सामाजिक किताबों का भी अध्ययन किया।
शास्त्री जी छोटे कद के एक साधारण आैर सरल बोलचाल वाले ईमानदार व्यक्ति थे। इसी तरह उनका पहनावा भी साधारण था। उन्होंने परिवहन, रेलवे, पुलिस आैर गृह मंत्रालय आदि मंत्रालयों में जिम्मेदारीपूर्वक मंत्री के रूप में काम किया। वह राज्यसभा के सदस्य रहे। उन्होंने परिवहन मंत्री के अपने कार्यकाल में देश की पहली महिला कंडक्टर की नियुक्ति की।
शास्त्री ने पुलिस मंत्री रहते हुए लाठीचार्ज आैर फायरिंग को प्रतिबंधित किया। इसके लिए उन्हें बहुत ख्याति मिली। उन्होंने ही पुलिस को खाकी का ताज दिया। यह ताज पुलिस को कैसे मिला। इस पर एक घटना है। एक बार शास्त्री जी क्रिकेट मैच देखने कानपुर गए तो एक व्यक्ति ने पुलिस द्वारा पहनी गई लाल पगड़ी पर आपत्ति की, जिसके परिणामस्वरू प उन्होंने उस व्यक्ति से वादा किया कि वह इस विषय पर ईमानदारी पूर्वक विचार करेंगे। कुछ समय बाद पुलिस को लाल की जगह खाकी पगड़ी दी गई।
शास्त्री जी के रेल मंत्री के कार्यकाल में यात्रियों को प्रथम, द्वितीय आैर तृतीय श्रेणी की सुविधा प्राप्त हुई। उन्होंने रेलवे की तरक्की के लिए भरसक प्रयास किए। जब तमिलनाडु आैर महबूब नगर में रेल दुर्घटना हुई तो उन्होंने इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से तुरंत इस्तीफा दे दिया। प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने उनका इस्तीफा स्वीकार करने से मना कर दिया, लेकिन वह नहीं माने आैर उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार किया।
प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद कश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी की जुबान पर यही प्रश्न था कि नेहरू के बाद अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। कांग्रेस पार्टी ने लाल बहादुर शास्त्री को अपना नेता चुन इस प्रश्न को विराम दिया। उनके चरित्र को देखते हुए सभी इस निर्णय पर एकमत थे कि शास्त्री जी ही ऐसे व्यक्ति है. जो देश का सही नेतृत्व कर सकते है। शास्त्री जी ने स्वयं पर कभी दबाव महसूस नहीं किया। वह कहते थे कि 'मैं एक साधारण व्यक्ति हूं न कि कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति।"
नेहरू जी के बाद उन्होंने भारतीय गणतंत्र के दूसरे प्रधानमंत्री के तौर पर कार्य करते हुए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए। उन्होंने सेना को ऐसे आधुनिक हथियार दिए जाने की वकालत की, जिन्हें वह युद्ध के समय केवल लड़ाई के लिए ही नहीं अपितु अपनी रक्षा के लिए भी प्रयोग कर सके। शास्त्री जी ने 1962 आैर 1965 के युद्ध के समय सेना का मनोबल बढ़ाया। देश को 'जय जवान, जय किसान" का नारा दिया। पाकिस्तान के साथ 1965 के युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के लाहौर शहर तक कब्जा कर लिया। जिसे बाद में ताशकंद समझौते के तहत पाकिस्तान को लौटाया दिया गया। इसी समझौते के बाद ताशकंद में 10 जनवरी 1966 में अचानक उनका निधन हो गया। उन्हें 'भारत रत्न" से भी सम्मानित किया गया।
बिना घर के गृहमंत्री
ऐसे समय जब नेता सरकारी सुविधाएं हासिल करने के लिए मारामारी करते रहते हैं, आपको यह जानकर अचरज होगा कि देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जब गृहमंत्री थे तो उनके पास अपना मकान तक नहीं था। वह इलाहाबाद में किराए के मकान में रहा करते थे। इस कारण लोग उन्हें 'बिना मकान का गृहमंत्री' कहा करते थे। दो अक्टूबर को 1904 को वाराणसी के मुगल सराय कस्बे में एक किसान परिवार में शास्त्री जी का जन्म हुआ। उनके पिता शारदा प्रसाद एक गरीब अध्यापक थे। बाद में उन्होंने इलाहाबाद के राजस्व विभाग में कलर्क के रूप में काम किया। उनकी माता का नाम राम दुलारी था। शास्त्री जी के बचपन का नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था। जब वह एक वर्ष के थे तो उनके पिता का निधन हो गया। उनका आैर उनके भाई-बहनों का पालन-पोषण उनकी मां दुलारी देवी ने किया। उनके दादा हजारीलाल उन्हें प्यार से 'नन्हें" पुकारते थे। लालबहादुर बचपन से ही सच्चे, ईमानदार आैर जिम्मेदार प्रवृत्ति के थे।
एक बार की घटना है, जब वह छह वर्ष के थे तो उनके मित्र एक बाग में फल तोड़ने के लिए उन्हें भी साथ ले गए, जब उनके मित्र फल तोड़ रहे थे तो बगीचे का चौकीदार आ गया। इस पर पेड़ पर चढे़ उनके सभी मित्र भाग गए, लेकिन वह वहीं खडे़ रहे। चौकीदार ने उन्हें पकड लिया। उन्हें पीटने लगा। तब उन्होंने कहा, मुझे मत मारों मैं अनाथ हूं। मैंने कुछ नहीं किया है। मैं झूठ नहीं बोल रहा हूं। मैंने तुम्हारे बाग को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है। इस पर चौकदार ने कहा, मैं जानता हूं कि तुम झूठ नहीं बोल रहे हो, लेकिन तुम्हें अपने व्यवहार में सुधार करना चाहिए। इससे दूसरों को कष्ट न पहुंचे।
रेलवे स्कूल में चौथी कक्षा तक पढ़ाई के बाद शास्त्री ने बनारस के हरिश्चंद हाई स्कूल में शिक्षा आरम्भ की। अपनी पढ़ाई के लिए उन्हें गंगा नदी के पार जाना पड़ता था। एक बार नाव के किराए के लिए पैसे नहीं होने पर शर्मिदंगी से बचने के लिए अपने मित्रों को बिना बताए नाव के जाने के बाद उन्होंने गंगा नदी को तैरकर पार किया। शास्त्री जी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से इतना प्रभावित थे कि वह उनका भाषण सुनने के लिए बनारस से 50 मील दूर गांव तक जा पहुंचे। तिलक के भाषण पर उनके ह्मदय पर गहरा प्रभाव पड़ा।
1915 में महात्मा गांधी का भाषण सुनने के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि वह अपना पूरा जीवन देश की सेवा में लगा देंगे। लाल बहादुर का जुड़ाव शुरू से ही गांधी जी के अहिंसा आंदोलन के साथ रहा आैर वह अंत तक कांग्रेस से जुडे़ रहे। जब वह 17 वर्ष के थे तो गांधी जी के आह्वान 'अंग्रेजों के सरकारी स्कूल कालेजों का बहिष्कार करो" पर उन्होंने स्कूल छोड़ दिया, जबकि उनकी माता आैर संबंधियों ने उन्हें स्कूल न छोड़ने की सलाह दी क्योंकि उनका काशी विद्या पीठ में चौथा वर्ष था। वह विद्यालय नहीं गए। इस विरोध के कारण उन्हें गिरफ्तार करने के बाद चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। 1930 में जब गांधी जी ने 'नमक सत्याग्रह" शुरू किया तो उसमें शास्त्री जी की मुख्य भूमिका रही। वह गांधी जी के स्वातंत्र्य वीरों की सेना के एक महान सेनानायक थे। 1928 में काशी विद्यापीठ से लाल बहादुर को 'शास्त्री" की डिग्री मिली। तब से वह श्रीवास्तव की जगह शास्त्री कह कर पुकारे जाने लगे। वह 1921 में लाला लाजपतराय द्वारा गठित 'पीपुल्स सोसायटी" के सदस्य भी रहे। सोसायटी का उद्देश्य युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रेरित करना था। बाद में उन्हें सोसायटी का अध्यक्ष बनाया गया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा।
1927 में शास्त्री जी का विवाह ललिता देवी से हुआ। उन्हें अपने ससुर से एक चरखा आैर कुछ गज खादी उपहार स्वरूप मिली। शास्त्री को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। उनकी गुरू नानक देव में विशेष रू चि थी। शास्त्री जी को पढ़ने के अलावा क्रिकेट देखने आैर लिखने का भी शौक था। उन्होंने मैडम क्यूरी की जीवनी का हिन्दी में अनुवाद भी किया आैर कई यूरोपीय लेखकों की दार्शनिक आैर सामाजिक किताबों का भी अध्ययन किया।
शास्त्री जी छोटे कद के एक साधारण आैर सरल बोलचाल वाले ईमानदार व्यक्ति थे। इसी तरह उनका पहनावा भी साधारण था। उन्होंने परिवहन, रेलवे, पुलिस आैर गृह मंत्रालय आदि मंत्रालयों में जिम्मेदारीपूर्वक मंत्री के रूप में काम किया। वह राज्यसभा के सदस्य रहे। उन्होंने परिवहन मंत्री के अपने कार्यकाल में देश की पहली महिला कंडक्टर की नियुक्ति की।
शास्त्री ने पुलिस मंत्री रहते हुए लाठीचार्ज आैर फायरिंग को प्रतिबंधित किया। इसके लिए उन्हें बहुत ख्याति मिली। उन्होंने ही पुलिस को खाकी का ताज दिया। यह ताज पुलिस को कैसे मिला। इस पर एक घटना है। एक बार शास्त्री जी क्रिकेट मैच देखने कानपुर गए तो एक व्यक्ति ने पुलिस द्वारा पहनी गई लाल पगड़ी पर आपत्ति की, जिसके परिणामस्वरू प उन्होंने उस व्यक्ति से वादा किया कि वह इस विषय पर ईमानदारी पूर्वक विचार करेंगे। कुछ समय बाद पुलिस को लाल की जगह खाकी पगड़ी दी गई।
शास्त्री जी के रेल मंत्री के कार्यकाल में यात्रियों को प्रथम, द्वितीय आैर तृतीय श्रेणी की सुविधा प्राप्त हुई। उन्होंने रेलवे की तरक्की के लिए भरसक प्रयास किए। जब तमिलनाडु आैर महबूब नगर में रेल दुर्घटना हुई तो उन्होंने इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से तुरंत इस्तीफा दे दिया। प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने उनका इस्तीफा स्वीकार करने से मना कर दिया, लेकिन वह नहीं माने आैर उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार किया।
प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद कश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी की जुबान पर यही प्रश्न था कि नेहरू के बाद अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। कांग्रेस पार्टी ने लाल बहादुर शास्त्री को अपना नेता चुन इस प्रश्न को विराम दिया। उनके चरित्र को देखते हुए सभी इस निर्णय पर एकमत थे कि शास्त्री जी ही ऐसे व्यक्ति है. जो देश का सही नेतृत्व कर सकते है। शास्त्री जी ने स्वयं पर कभी दबाव महसूस नहीं किया। वह कहते थे कि 'मैं एक साधारण व्यक्ति हूं न कि कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति।"
नेहरू जी के बाद उन्होंने भारतीय गणतंत्र के दूसरे प्रधानमंत्री के तौर पर कार्य करते हुए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए। उन्होंने सेना को ऐसे आधुनिक हथियार दिए जाने की वकालत की, जिन्हें वह युद्ध के समय केवल लड़ाई के लिए ही नहीं अपितु अपनी रक्षा के लिए भी प्रयोग कर सके। शास्त्री जी ने 1962 आैर 1965 के युद्ध के समय सेना का मनोबल बढ़ाया। देश को 'जय जवान, जय किसान" का नारा दिया। पाकिस्तान के साथ 1965 के युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के लाहौर शहर तक कब्जा कर लिया। जिसे बाद में ताशकंद समझौते के तहत पाकिस्तान को लौटाया दिया गया। इसी समझौते के बाद ताशकंद में 10 जनवरी 1966 में अचानक उनका निधन हो गया। उन्हें 'भारत रत्न" से भी सम्मानित किया गया।
मंगलवार, सितंबर 28, 2010
शनिवार, सितंबर 25, 2010
अव्यवस्था की भेंट चढ़े गजराज
कुछ खास
रेलवे पर क्षुब्ध हुए पर्यावरण मंत्री : पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी रेल पटरियों पर बृहस्पतिवार को हुई सात हाथियों की मौत से क्षुब्ध पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि वह जल्द ही रेलवे बोर्ड से मिलेंगे, ताकि हाथियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। उन्होंने घटना पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि विगत समय में वह रेल मंत्री ममता बनर्जी आैर रेलवे बोर्ड के अधिकारियों को कई पत्र लिख चुके हैं। ऐसे हादसों को टालने के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर चर्चा कर चुके हैं।कारण तथा निदान
-पश्चिम बंगाल के प्रधान मुख्य वन संरक्षक अतनु राहा ने कहा कि मीटर गेज को ब्राड गेज में बदले जाने के बाद हाथियों के ट्रेन से कुचलकर मरने की घटनाएं बढ़ गई हैं। दरअसल जब मीटर गेज था तब कुछ ट्रेनें चलती थी आैर हाथियों को उनके गुजरने का समय मालूम होता था, लेकिन गेज परिवर्तन के बाद हर समय मालगाडियां गुजरती रहती है, जिससें हाथी संशय में पड़ जाते हैं आैर ऐसे हादसे होते हैं।
-गेज परिवर्तन के खिलाफ वर्ष 2001 में जनहित याचिका दायर करने वाले डब्ल्यूपीएसआई के पूर्वी क्षेत्र के निदेशक कर्नल एस बनर्जी ने कहा कि उनकी आशंका अब सही साबित हो रही है। हाथियों को ऐसे हादसों से बचाने के लिए उपरिगामी ट्रेन का सुझाव आया है।
-संयोग से जलपाईगुड़ी क्षेत्र हाथी गलियारे के रूप में घोषित है आैर हाथियों को सुरक्षित रूप से गुजरने देने के लिए रेलवे से ट्रेनों की गति धीमी करने जैसे विशेष कदम उठाने को कहा गया है।
23 वर्षों में 150 गजराज चढ़े भेंट
राज्य शिकार हुए गजराज
प. बंगाल : 39
उत्तराखंड : 21
झारखंड : 15
तमिलनाडु : 09
उत्तर प्रदेश : 06
केरल : 03
उड़ीसा : 03
-हादसे जनवरी से जून के बीच रात के समय ज्यादा हुए
-जब जंगली जानवर भोजन-पानी की तलाश में निकलते हैं
-जंगलों में रात के समय ट्रेनों की गति कम रखनी चाहिए
-घटनाओं को टालने के लिए ट्रेन के ड्राइवर, गार्ड आैर मुसाफिरों को भी संवेदनशील बनाने की जरूरत
(रुाोत : पर्यावरण मंत्रालय की 'ऐलीफेंट टास्क फोर्स" की नवीनतम रिपोर्ट)
कमेंट........
आखिर कौन है जिम्मेदार ? एक साथ सात हाथियों की रेलवे पटरियों पर मौत की आवाज राजनीतिक गलियारों में नहीं सुनाई पड़ी। पश्चिम बंगाल की जलपाइगुड़ी की घटना पर किसी ने हो हल्ला नहीं किया। पशुओं पर दया दिखाने वाली मेनका गांधी के सूर भी इस बार नहीं सुनाई पड़े। राजनीतिक दल भी मौन हैं, क्यों कि इससे उनको कोई राजनीतिक फायदा नहीं मिलने वाला है। फिर वे अपनी मेहनत आैर ऊर्जा क्यों अनायास बेकार करते। फिलहाल पर्यावरणविदों ने जलपाईगुड़ी की घटना को हत्या करार दिया है आैर रेलवे के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है
आखिर कौन है जिम्मेदार ? एक साथ सात हाथियों की रेलवे पटरियों पर मौत की आवाज राजनीतिक गलियारों में नहीं सुनाई पड़ी। पश्चिम बंगाल की जलपाइगुड़ी की घटना पर किसी ने हो हल्ला नहीं किया। पशुओं पर दया दिखाने वाली मेनका गांधी के सूर भी इस बार नहीं सुनाई पड़े। राजनीतिक दल भी मौन हैं, क्यों कि इससे उनको कोई राजनीतिक फायदा नहीं मिलने वाला है। फिर वे अपनी मेहनत आैर ऊर्जा क्यों अनायास बेकार करते। फिलहाल पर्यावरणविदों ने जलपाईगुड़ी की घटना को हत्या करार दिया है आैर रेलवे के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है
शुक्रवार, सितंबर 24, 2010
विवाद के 157 साल
कुछ खास

विवाद की जड़
1528 : मुगल बादशाह बाबर ने उस भूमि पर एक मस्जिद बनवाई। हिंदुओं का दावा है कि वह भगवान राम की जन्मभूमि है आैर वहां पहले एक मंदिर था।
1853 : विवादित भूमि पर सांप्रदायिक हिंसा संबंधी घटनाओं का दस्तावेजों में दर्ज पहला प्रमाण।
1859 : ब्रिाटिश अधिकारियों ने एक बाड़ बनाकर पूजास्थलों को अलग-अलग किया। अंदरूनी हिस्सा मुस्लिमों को आैर बाहरी हिस्सा हिन्दुओं को मिला।
1885 : महंत रघुवीर दास ने एक याचिका दायर कर रामचबूतरे पर छतरी बनवाने की अनुमति मांगी, लेकिन फैजाबाद की जिला अदालत ने अनुरोध खारिज किया।
देश का सबसे बड़ा मुकदमा
-1950, 16 जनवरी को मुकदमें की प्रक्रिया शुरू ।
-21 साल चली सुनवाई।
-40 अधिवक्ताओं ने इस मामले में जिरह की। (पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम आैर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ शंकर रे, भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा सुप्रीम कोर्ट के वकील रवि शंकर प्रसाद भी शामिल)
-89 गवाहों के 14,036 पृष्ठ के बयान दर्ज हुए।
-इस दौरान 13 बार विशेष पूर्णपीठ तथा 18 न्यायाधीश बदले गए।
चार अहम बिंदु
1-विवादित धर्मस्थल पर मालिकाना हक किसका है ?
2-श्रीराम जन्मभूमि वहीं है या नहीं ?
3-क्या 1528 में मन्दिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनी थी ?
4-यदि ऐसा है तो यह इस्लाम के परंपराओं के खिलाफ है या नहीं ?
गुम्बद के नीचे में रखे गए रामलला
-1949 : 22/23 सितम्बर की रात में विवादित ढांचे के तीन गुम्बदों में से बीच वाले में रामलला की मूर्ति रख दी गई।
-1950 : 16 जनवरी को रामलला की पूजा अर्चना के लिए को गोपाल सिंह ने फैजाबाद की जिला अदालत का दरवाजा खटखटाया।
-कोर्ट ने पूजा अर्चना की इजाजत दे दी। इसके साथ ही कोर्ट ने वहां रिसीवर भी नियुक्त कर दिया।
-1959 : निर्मोही अखाडे़ ने रिसीवर की व्यवस्था समाप्त कर विवादित स्थल को उसे सौंपने की मांग की।
-1961 : सुन्नी वक्फ बोर्ड आैर मोहम्मद हाशिम अंसारी ने रामलला की मूर्ति हटाने के लिए वाद दायर किया।
-1989 : देवकी नन्दन अग्रवाल ने विवादित धर्मस्थल को रामलला विराजमान की संपत्ति घोषित करने की याचिका हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में दाखिल की।
-1989 : फैजाबाद में चल रहे सारे मामलों को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के हवाले किया गया।
-सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड ने अपने पक्ष से 36 गवाहों को पेश किया। इसमें आठ बहुसंख्यक सुमदाय से थे।
-वक्फ बोर्ड की तरफ से सर्वाधिक 288 पृष्ठ की गवाही सुरेश चन्द्र मिश्र की रही, जबकि सबसे कम 64 पृष्ठ में रामशंकर उपाध्याय ने अपना बयान दर्ज कराया।
मामले में नया मोड़
-1986 : 1 फरवरी को जिला जज कृष्ण मोहन पाण्डेय ने विवादित ढांचे के गेट पर लगे ताले को खोलने का आदेश दिया।
-1986 : 3 फरवरी को अंसारी ने हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में इस आदेश को चुनौती दी।
-1992 : 6 दिसम्बर को विवादित मस्जिद ढहाई गई। देश भर में सांप्रदायिक दंगे, 2000 से अधिक लोगों की जानें गर्इं।
अधिग्रहण के खिलाफ मुकदमा
-1993 : 7 जनवरी को केंद्र ने 67 एकड़ से अधिक जमीन का अधिग्रहण कर लिया।
-अधिग्रहण के इस अधिनियम के खिलाफ सेन्ट्रल सुन्नी बोर्ड, अक्षय ब्राह्चारी, हाफिज महमूद अकलाख आैर जामियातुल उलेमा-ए-हिन्द ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
-हाईकोर्ट ने सभी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट भेज दिया।
-1994 : 24 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले से जुड़े सन्दर्भ को राष्ट्रपति को वापस भेज दिया।
-1995 : जनवरी में हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में फिर से सुनवाई शुरू हुई।
-2002 : मार्च में मामले को जल्दी निपटाने के लिए हाईकोर्ट का प्रतिदिन सुनवाई करने का फैसला।
-2003 : 5 मार्च का अधिग्रहीत परिसर में पुरातात्विक खुदाई के आदेश दिए।
-22 अगस्त को पुरातत्व विभाग ने अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपी। खुदाई में प्राचीन मूर्तियों आैर कसौटी के पत्थरों के अवशेष मिलने का दावा।
-2006 : 11 अगस्त को मुस्लिम पक्ष की ओर से पुरातात्विक रिपोर्ट के खिलाफ आपत्तियों के सम्बंध में गवाहियों का क्रम समाप्त हुआ।
-2010 : 26 जुलाई को सुनवाई पूरी हुई। कोर्ट ने दोनो पक्षों के वकीलों को बुलाकर सुलह-समझौते से निपटाने का अवसर दिया।
-15 सितम्बर : इस सम्बंध में रमेश चन्द्र त्रिपाठी की अर्जी पेश।
-17 सितम्बर : न्यायमूर्ति एसयूखान आैर न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने त्रिपाठी की याचिका खारिज की। उन पर हर्जाने के रूप में 50 हजार रुपए जुर्माना ठोक दिया।
-पीठ के तीसरे न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने दोनों की राय से अपने को अलग किया। श्री शर्मा ने हर्जाने की राशि तीन हजार कर दी तथा पक्षकारों को सुलह के लिए 23 सितम्बर तक का समय दिया।
-21 सितम्बर : त्रिपाठी ने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई से इनकार किया। याची को दूसरी खंडपीठ में जाने की सलाह दी।
-दूसरी पीठ ने हाईकोर्ट के 24 सितम्बर को फैसला सुनाए जाने के आदेश को 28 सितम्बर तक स्थगित कर दिया।
17 साल बाद लिब्राहान आयोग की रिपोर्ट
1992 : 16 दिसंबर को विवादित ढांचे को ढहाए जाने की जांच के लिए न्यायमूर्ति लिब्राहान आयोग का गठन। छह माह के भीतर जांच खत्म करने को कहा गया।
2009 : जून में 17 साल बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस बीच आयोग का कार्यकाल 48 बार बढ़ाया गया।
शुक्रवार, सितंबर 17, 2010
..जब 'छोटे लोहिया' से परास्त हुए वीपी
इतिहास से दिलचस्प मुकाबला
लोकसभा चुनाव के कुछ उन मुकाबलों में जिन्हें रोचक कहा जा सकता है, 'छोटे लोहिया' की राजा मांडा से भिडंत भी शामिल है. इसमें 'छोटे लोहिया' कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्र ने वीपी सिंह को परास्त किया था. यह 1977 का आम चुनाव था. इलाहबाद संसदीय सीट से प्रमुख मुकाबला कांग्रेस और भालोद के बीच था. वीपी कांग्रेस के उम्मीदवार थे. 'छोटे लोहिया' ने राजा को करीब 90 हजार मतों के अंतर से पराजित किया. जनेश्वर को 190697 और वीपी को 100709 मत मिले. दरअसल, 1977 में कांग्रेस की फिजां गड़बड़ थी. जनता पार्टी की लहर थी. वीपी चुनाव हार गए. वीपी के राजनीतिक करियर की शुरुआत छात्र राजनीति से हुई. 1947 में वे इलाहाबाद विवि छात्रसंघ के उपाध्यक्ष चुने गए. स्वराज भवन में उनका आना-जाना नेहरू के समय से ही था. तब उनकी पहचान बतौर 'राजा मांडा' थी. वह 1969 में विधानसभा के लिए चुने गए. 1971 में पहली बार पांचवी लोकसभा के लिए इलाहाबाद के फूलपुर क्षेत्र से निर्वाचित हुए. 1976 में पहली बार वे केंद्र में मंत्री बने. 1980 में वे फिर लोकसभा के लिए चुने गए. बीच में ही उन्हें कांग्रेस आलाकमान ने उप्र का मुख्यमंत्री बनाने का एलान किया. उस समय इंदिरा गाँधी प्रधानमन्त्री थीं. इंदिरा जी की मौत के बाद 1984 के आम चुनावों में कांग्रेस की बंपर मतों से जीत हुई. राजीव गाँधी प्रधानमन्त्री हुए. वीपी सिंह वाणिज्य, वित्त और बाद में रक्षामंत्री बने. कालान्तर में राजीव से अनबन होने पर उन्होंने कांग्रेस पार्टी से अलविदा कर लिया. 1988 में इलाहाबाद सीट पर उपचुनाव हुआ. वीपी स्वतंत्र उम्मीदवार लड़े और विजयी हुए. 1989 के आम चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ विपक्ष को एकजुट कर जनता दल का गठन किया. कांग्रेस के लिए संकट बने. जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. केंद्र में जनता दल की सरकार बनी. वीपी सिंह देश के दसवें प्रधानमन्त्री बने.
लोकसभा चुनाव के कुछ उन मुकाबलों में जिन्हें रोचक कहा जा सकता है, 'छोटे लोहिया' की राजा मांडा से भिडंत भी शामिल है. इसमें 'छोटे लोहिया' कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्र ने वीपी सिंह को परास्त किया था. यह 1977 का आम चुनाव था. इलाहबाद संसदीय सीट से प्रमुख मुकाबला कांग्रेस और भालोद के बीच था. वीपी कांग्रेस के उम्मीदवार थे. 'छोटे लोहिया' ने राजा को करीब 90 हजार मतों के अंतर से पराजित किया. जनेश्वर को 190697 और वीपी को 100709 मत मिले. दरअसल, 1977 में कांग्रेस की फिजां गड़बड़ थी. जनता पार्टी की लहर थी. वीपी चुनाव हार गए. वीपी के राजनीतिक करियर की शुरुआत छात्र राजनीति से हुई. 1947 में वे इलाहाबाद विवि छात्रसंघ के उपाध्यक्ष चुने गए. स्वराज भवन में उनका आना-जाना नेहरू के समय से ही था. तब उनकी पहचान बतौर 'राजा मांडा' थी. वह 1969 में विधानसभा के लिए चुने गए. 1971 में पहली बार पांचवी लोकसभा के लिए इलाहाबाद के फूलपुर क्षेत्र से निर्वाचित हुए. 1976 में पहली बार वे केंद्र में मंत्री बने. 1980 में वे फिर लोकसभा के लिए चुने गए. बीच में ही उन्हें कांग्रेस आलाकमान ने उप्र का मुख्यमंत्री बनाने का एलान किया. उस समय इंदिरा गाँधी प्रधानमन्त्री थीं. इंदिरा जी की मौत के बाद 1984 के आम चुनावों में कांग्रेस की बंपर मतों से जीत हुई. राजीव गाँधी प्रधानमन्त्री हुए. वीपी सिंह वाणिज्य, वित्त और बाद में रक्षामंत्री बने. कालान्तर में राजीव से अनबन होने पर उन्होंने कांग्रेस पार्टी से अलविदा कर लिया. 1988 में इलाहाबाद सीट पर उपचुनाव हुआ. वीपी स्वतंत्र उम्मीदवार लड़े और विजयी हुए. 1989 के आम चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ विपक्ष को एकजुट कर जनता दल का गठन किया. कांग्रेस के लिए संकट बने. जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. केंद्र में जनता दल की सरकार बनी. वीपी सिंह देश के दसवें प्रधानमन्त्री बने.
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