
शुक्रवार, सितंबर 17, 2010
..जब 'छोटे लोहिया' से परास्त हुए वीपी
इतिहास से दिलचस्प मुकाबला
लोकसभा चुनाव के कुछ उन मुकाबलों में जिन्हें रोचक कहा जा सकता है, 'छोटे लोहिया' की राजा मांडा से भिडंत भी शामिल है. इसमें 'छोटे लोहिया' कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्र ने वीपी सिंह को परास्त किया था. यह 1977 का आम चुनाव था. इलाहबाद संसदीय सीट से प्रमुख मुकाबला कांग्रेस और भालोद के बीच था. वीपी कांग्रेस के उम्मीदवार थे. 'छोटे लोहिया' ने राजा को करीब 90 हजार मतों के अंतर से पराजित किया. जनेश्वर को 190697 और वीपी को 100709 मत मिले. दरअसल, 1977 में कांग्रेस की फिजां गड़बड़ थी. जनता पार्टी की लहर थी. वीपी चुनाव हार गए. वीपी के राजनीतिक करियर की शुरुआत छात्र राजनीति से हुई. 1947 में वे इलाहाबाद विवि छात्रसंघ के उपाध्यक्ष चुने गए. स्वराज भवन में उनका आना-जाना नेहरू के समय से ही था. तब उनकी पहचान बतौर 'राजा मांडा' थी. वह 1969 में विधानसभा के लिए चुने गए. 1971 में पहली बार पांचवी लोकसभा के लिए इलाहाबाद के फूलपुर क्षेत्र से निर्वाचित हुए. 1976 में पहली बार वे केंद्र में मंत्री बने. 1980 में वे फिर लोकसभा के लिए चुने गए. बीच में ही उन्हें कांग्रेस आलाकमान ने उप्र का मुख्यमंत्री बनाने का एलान किया. उस समय इंदिरा गाँधी प्रधानमन्त्री थीं. इंदिरा जी की मौत के बाद 1984 के आम चुनावों में कांग्रेस की बंपर मतों से जीत हुई. राजीव गाँधी प्रधानमन्त्री हुए. वीपी सिंह वाणिज्य, वित्त और बाद में रक्षामंत्री बने. कालान्तर में राजीव से अनबन होने पर उन्होंने कांग्रेस पार्टी से अलविदा कर लिया. 1988 में इलाहाबाद सीट पर उपचुनाव हुआ. वीपी स्वतंत्र उम्मीदवार लड़े और विजयी हुए. 1989 के आम चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ विपक्ष को एकजुट कर जनता दल का गठन किया. कांग्रेस के लिए संकट बने. जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. केंद्र में जनता दल की सरकार बनी. वीपी सिंह देश के दसवें प्रधानमन्त्री बने.

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