सोमवार, फ़रवरी 28, 2011

आम बजट

कैसे तैयार होता है आम बजट


बजट के ज़रिए केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियां तय करने का काम सरकार का एक कोर ग्रुप करता है. इस कोर ग्रुप में प्रधानमंत्री के अलावा वित्त मंत्री और वित्त मंत्रालय के अधिकारी होते हैं. योजना आयोग के उपाध्यक्ष को भी इस ग्रुप में शामिल किया जाता है

वित्त मंत्रालय की ओर से प्रशासनिक स्तर पर जो अधिकारी होते हैं उसमें वित्त सचिव के अलावा राजस्व सचिव और व्यय सचिव शामिल होते हैं. यह कोर ग्रुप वित्त मंत्रालय के सलाहकारों के नियमित संपर्क में रहता है. वैसे इस कोर ग्रुप का ढाँचा सरकारों के साथ बदलता भी है.
बैठक दर बैठक
बजट पर वित्त मंत्रालय की नियमित बैठकों में वित्त सचिव, राजस्व सचिव, व्यय सचिव, बैंकिंग सचिव, संयुक्त सचिव (बजट) के अलावा केंद्रीय सीमा एवं उत्पाद शुल्क बोर्ड के अध्यक्ष हिस्सा लेते हैं.
वित्तमंत्री को बजट पर मिलने वाले योजनाओं और खर्चों के सुझाव वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग को भेज दिए जाते हैं जबकि टैक्स से जुड़े सारे सुझाव वित्त मंत्रालय की टैक्स रिसर्च यूनिट को भेजे जाते हैं.
इस यूनिट का प्रमुख एक संयुक्त सचिव स्तर का अधिकारी होता है. प्रस्तावों और सुझावों के अध्ययन के बाद ये यूनिट कोर ग्रुप को अपनी अनुशंसाएँ भेजती है.
पूरी बजट निर्माण प्रक्रिया के समन्वय का काम वित्त मंत्रालय का संयुक्त सचिव स्तर का एक अधिकारी करता है.
बजट के निर्माण से लेकर बैठकों के समय तय करने और बजट की छपाई तक सारे कार्य इसी अधिकारी के ज़रिए होते हैं

भारी गोपनीयता
बजट निर्माण की प्रक्रिया को इतना गोपनीय रखा जाता है कि संसद में पेश होने तक इसकी किसी को भनक भी न लगे.

इस गोपनीयता को सुनिश्चित करने के लिए वित्त मंत्रालय के नार्थ ब्लाक स्थित दफ्तर को बजट पेश होने के कुछ दिनों पहले से एक अघोषित 'क़ैदखाने' में तब्दील कर दिया जाता है.
बजट की छपाई से जुड़े कुछ कर्मचारियों को यहां पुलिस व सुरक्षा एजेंसियों के कड़े पहरे में दिन-रात रहना होता है.
बजट के दो दिन पहले तो नार्थ ब्लाक में वित्त मंत्रालय का हिस्सा तो पूरी तरह सील कर दिया जाता है.
यह सब वित्त मंत्री के बजट भाषण के पूरा होने और वित्त विधेयक के रखे जाने के बाद ही समाप्त होता है.



रविवार, फ़रवरी 20, 2011

21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस

भारत : खतरे में 196 भाषाएं
अंगेजी के वर्चस्व और संरक्षण ने सर्वाधिक नुकसान भारत में बोली जाने वाली भाषाओं का किया है। भारत में स्थिति सर्वाधिक चिंताजनक है। देश में 196 भाषाएं लुप्त होने को हैं। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, दुनियाभर में ऐसी सैंकड़ों भाषाएं हैं जो विलुप्त होने के कगार पर हैं।
भारत के बाद दूसरे नंबर पर अमेरिका में स्थिति काफी चिंताजनक है, जहां ऐसी 192 भाषाएं दम तोड़ती नजर आ रही हैं। विश्व ईकाई द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार, भाषाएं आधुनिकीकरण के दौर में प्रजातियों की तरह विलुप्त होती जा रही हैं। एक अनुमान के अनुसार, दुनियाभर में 6900 भाषाएं बोली जाती हैं लेकिन इनमें से 2500 भाषाओं को चिंताजनक स्थिति वाली भाषाओं की सूची में रखा गया है।
तो खत्म हो जाएंगी 2500 भाषाएं : रिपोर्ट कहती है कि ये 2500 भाषाएं ऐसी हैं जो पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी। अगर संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2001 में किए गए अध्ययन से इसकी तुलना की जाए तो पिछले एक दशक में बदलाव काफी तेजी से हुआ है। उस समय विलुप्तप्राय: भाषाओं की संख्या मात्र नौ सौ थी लेकिन यह गंभीर चिंता का विषय है कि तमाम देशों में इस ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है। भारत, अमेरिका के बाद इस सूची में इंडोनेशिया का नाम आता है जहां 147 भाषाओं का आने वाले दिनों में कोई नाम लेवा नहीं रहेगा। संयुक्त राष्ट्र ने ये आंकड़े 21 फरवरी 2009 को अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस की पूर्व संध्या पर जारी किए थे। भाषाओं के कमजोर पड़कर दम तोड़ने की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनियाभर में 199 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या एक दर्जन लोगों से भी कम है। इनमें कैरेम भी एक ऐसी ही भाषा है जिसे उक्र ेन में मात्र छह लोग बोलते हैं। ओकलाहामा में विचिता भी एक ऐसी भाषा है जिसे देश में मात्र दस लोग ही बोलते हैं। इंडोनेशिया में इसी प्रकार लेंगिलू बोलने वाले केवल चार लोग बचे हैं। 178 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वाले लेागों की संख्या 150 से कम है। दुनियाभर में भाषाओं की इसी स्थिति के कारण संयुक्त राष्ट्र ने 1990 के दशक में 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस मनाए जाने की घोषणा की थी।
बांगलादेश ने दिखाई राह : बांग्लादेश में 1952 में भाषा को लेकर एक आंदोलन चला था। इसमें हजारों लोगों ने अपनी जान दी थी। इस आंदोलन के बारे में कहा जाता है कि इसी से बांग्लादेश की आजादी के आंदोलन की नींव पड़ी थी आैर भारत के सहयोग से नौ महीने तक चले मुक्ति संग्राम की परिणति पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बनने के रूप में हुई थी। इस आंदोलन की शुरूआत तत्कालीन पाकिस्तान सरकार द्वारा देश के पूर्वी हिस्से पर भी राष्ट्र भाषा के रूप में उर्दू को थोपे जाने के विरोध से हुई थी।

नेहरू की वसीयत

 नेहरू की वसीयत
बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी वसीयत भी लिखी थी जो कि आज तक खोली नहीं गई। यह एक बैंक में अब भी रखी हुई है। इसी बैंक में जलियांवाला कांड के समय पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर रहे जनरल माइकल डायर का भी खाता था। डायर के लंदन चले जाने के बाद तक यह खाता जारी रहा। जलियांवाला बाग में गोली चलाने का आदेश देने वाले ब्रिागेडियर जनरल रेगीनाल्ड डायर का खाता भी उसी बैंक में था।
 लखनऊ में तैनात इलाहाबाद बैंक के सहायक महाप्रबंधक हरिमोहन ने बताया कि दस्तावेजों की खोजबीन के दौरान हमारे हाथ लगी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की वसीयत जो एक बंद लिफाफे में अब भी बैंक की सेफ कस्टडी में रखी हुई है। उन्होंने बताया कि उपलब्ध लेजरों के अनुसार पंडित नेहरू ही नहीं बल्कि उनके पिता पंडित मोतीलाल नेहरू का भी इलाहाबाद बैंक में खाता था। उस समय बैंक में केवल अंग्रेजों और तब के राजा महाराजाओं और  नवाब - तालुकेदारों के ही खाते खोले जाते थे और डिप्टी कलक्टर से नीचे के किसी आम भारतीय का खाता खोला ही नहीं जाता था।
      हरिमोहन ने वर्ष 1892 का एक लेजर दिखाया जिसमें प्रदेश के कई राजाओं, महाराजाओं और तालुकेदारों के खातों में हजारों रुपए के लेन-देन के ब्यौरे हैं और सुल्तानपुर अंचल के तत्कालीन राजा पट्टी के खाते में तो तीन लाख से अधिक रुपए जमा थे। जलियांवाला नरसंहार के समय पंजाब के गवर्नर रहे जनरल डायर के नाम पर बैंक में 10 हजार रुपए जमा थे और बैंक में उस नरसंहार के खलनायक  बिग्रेडियर जनरल रेगीनाल्ड डायर का भी खाता था।     
      उन्होंने बताया कि हम शीघ ही बैंक के लखनऊ स्थित सौ साल पुराने भवन में एक संग्रहालय बनाने जा रहे हैं। इसमें बैंक की स्थापना से लेकर आज तक के अनेक दुर्लभ लेजर और दस्तावेज आम जनता के लिए रखे जाएंगे, जिनके पन्नों पर इतिहास की अनेक रोचक जानकारी अंकित हैं।

1865 में हुई बैंक की स्थापना
    वर्ष 1865 में पांच यूरोपीय नागरिकों द्वारा इलाहाबाद बैंक की शुरुआत हुई। बैंक की पहली शाखा इलाहाबाद में वर्ष 1865 में पांच यूरोपीय लोगों ने खोली और दूसरी शाखा कोलकाता में खोली गई। इलाहाबाद बैंक मूलत: अंग्रेजों का बैंक था। इसकी शुरुआती शाखाएं अंग्रेजी साम्राज्य के लिए रणनीतिक और सैनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहे कोलकाता, मेरठ, झांसी,  लखनऊ और कानपुर में खोली गई और  उन इलाकें में खोली गर्इं जहां अंग्रेज अधिकारियों के निवास थे और  जहां से उनका राजकाज चलता था।
     

बुधवार, फ़रवरी 16, 2011

सौ साल पुरानी हवाई डाक सेवा की कहानी दोहरायी गयी

 दुनिया की पहली हवाई डाक सेवा भारत मे
करीब सौ साल पहले 18 फरवरी, 1911 को इलाहाबाद से नैनी (इलाहाबाद) तक 6500 पत्रों को लेकर जाने वाली प्रथम आधिकारिक हवाई डाक सेवा हुई की गई थी। इसे फ्रांस के पायलट हेनरी पीक्वेट ने उड़ाया था। यह विश्व की सर्वप्रथम हवाई डाक सेवा का शुभारंभ था।


18 फरवरी, 1911 को उस इतिहास रचा गया जब हेनरी पीक्वेट ने इलाहाबाद में यमुना के दाहिने किनारे से एक हेवर हवाई जहाज ने उड़ान भरी और  यमुना नदी पार कर 6500 पत्र और पोस्टकार्ड वाली डाक थेले को नैनी रेलवे स्टेशन पर ड्राप किया था। इससे भारत विश्व में हवाई डाक पहुंचाने वाला पहला देश बन गया था। हवाई डाक सेवा के सौ वर्ष पूरे होने की स्मृति में डाक विभाग द्वारा आयोजित समारोह में राज्यपाल जोशी ने बमरौली हवाई अड्डे से चेतक हेलीकाप्टर को झंडी दिखाकर रवाना किया। 500 पत्रों से भरे डाक थैले को ले जाने वाले इस चेतक के पायलट विंग कमांडर मुकेश कोठारी एवं स्क्वाड्रन लीडर अंशुल सक्सेना थे। उड़ान भरने के बाद हेलीकाप्टर पीएसी की ग्राउन्ड नैनी में पत्रों के थैले को डाक विभाग को सौंपा। डाक विभाग ने इस अवसर पर चार डाक टिकटों का एक सेट जारी किया। इसका विमोचन राज्यपाल ने किया।


हवाई डाक सेवा के 100 वर्ष पर चार डाक टिकटों के सेट प्रथम दिवस आवरण और मिनी शीट के माध्यम से डाक विभाग ने यमुना नदी के ऊपर से की गई प्रथम हवाई डाक उड़ान के इतिहास को उड़ान के पथ के साथ-साथ इस हवाई जहाज और पायलट को अंकित किया है। पृष्ठभूमि में इलाहाबाद का किला है। प्रथम दिवस आवरण पर विगत वर्षों में जारी किये गए डाक टिकटों के कोलाज को दर्शाया गया है।

मंगलवार, फ़रवरी 15, 2011

राह दिखाते शास्त्री जी.....

देश के दूसरे प्रधानमंत्री की जीवन शैली आज के दौर में दूसरे राजनेताओं के लिए एक नेक राह दिखाने का काम कर सकती है। उनके बेटे सुनील शास्त्री द्वार लिखी गई पुस्तक 'लाल बहादुर शास्त्री पास्ट फारवर्ड" के कुछ अंश...


'स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब बाबूजी फैज़ाबाद जेल में बंद थे आैर मां उनके लिए दो आम छिपा कर ले गई थी, तब वह काफी नाराज हुए थे। वह इसलिए नाराज हुए थे, क्योंकि कैदियों को बाहर से भोजन उपलब्ध कराना अवैध है। लालबहादु ने रेल मंत्री के रूप में ट्रेनों में एक सामान्य नागरिक की तरह यात्रा की। पुस्तक में बचपन की कई घटनाओं का जिक्र किया है। इसी संदर्भ में एक घटना का जिक्र करते हुए सुनिल ने लिखा, 'मैं बचपन में बड़ी गाड़ी में सफर करने का सपना देखा करता था जो मेरे पिता के दर्जे के अनुरूप हो। बाबूजी को उपयोग के लिए सेवरले अंपाला कार मिली थी।"

'एक दिन मैंने बाबूजी के निजी सचिव से सेवरले अंपाला गाड़ी को घर लाने का आग्रह किया। हमने कार चालक से चाबी मांगी और  उसे चला कर ले गए।" बाबूजी ने कार के चालक से नाराजगी भरे अंदाज में पूछा, 'क्या आप अपने साथ लॉग बुक रखते हैं।" जब चालक ने नकारात्मक जबाव दिया तब उन्होंने पिछले दिन कार द्वारा तय की गई दूरी की जानकारी मांगी। चालक ने जब दूरी 14 किलोमीटर बताई जब उन्होंने मां से निजी सचिव को इसका भुगतान करने को कहा जो राशि सरकारी खाते में गई।

पुस्तक में एक घटना का जिक्र है कि लालबहादुर शास्त्री शायद जीवन में उस दिन पहली बार रोए थे। शास्त्री भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 में हुए युद्ध के दौरान घायल सैनिकों को देखने अस्पताल गए थे। अस्पताल में एक घायल सैनिक ने कहा कि वह आज उठने की स्थिति में भी नहीं है, ताकि वह अपने प्रिय प्रधानमंत्री को 'सलाम" कर सके। इतना सुनते ही वह फूट फूट कर रोने लगे थे।

रविवार, फ़रवरी 13, 2011

फूल के रंगों में छिपे प्रेम के रंग
वेलेंटाइन डे पर लोग कुछ न कुछ खास तोहफा देना चाहते हैं। आप भी देना चाहते होंगे। बहुत अच्छी बात है, मगर इन तोहफों की भीड़ में उनके लिए फूल ले जाना मत भूलिएगा। क्योंकि फूल ही हैं जो आपके दिल की बात उन तक पहुंचाते हैं। फूल बगैर एक शब्द बोले, आसानी से आपके मन का हर राज खोल देते हैं।



वेलेंटाइन डे पर अगर आप यह सोच कर परेशान हैं कि लाल गुलाब के अलावा अगर अपने प्रेमी को कुछ नया देना चाहते हैं तो क्या दें ? आपकी यह परेशानी भी दूर हो सकती है। सफेद गुलाब बढि़या विकल्प है। वैसे सफेद गुलाब शांति के लिए माना जाता है। लेकिन अगर आप किसी को खूबसूरत कहना चाहते हैं तो सफेद गुलाब दें। अगर आप यह कहना चाहते हैं कि आपसे बेहतर कोई नहीं। वह आपके लिए सबसे खास हैं। आपके जीवन में उनके बगैर एक खालीपन सा है तो नारंगी रंग का गुलाब दें। अगर शादी के लिए प्रोपोज करना चाहते हैं तो 'गाढ़े लाल रंग" के गुलाब के साथ अंगूठी दें। फिर आप सोच क्या रहे हैं ? बस उठिए आैर प्यार का इजहार कर दीजिए।

शुक्रवार, फ़रवरी 11, 2011

गर्भनिरोधक के इस्तेमाल के बाद गर्भपात पर दिया फतवा

 भ्रूण का गर्भपात कराना भी हराम : देवबंद



दारुल उलूम देवबंद ने अपने नए फतवे में गर्भ में पल रहे तीन महीने से ज्यादा के भ्रूण का गर्भपात कराने को भी हराम बताया है।


गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल के पहले हकीम से पूछने का फतवा देने के बाद देवबंद ने कहा है कि यदि गर्भ में पल रहे भ्रूण की उम्र तीम माह से कम है तो गर्भपात कराने के पहले भी हकीम या किसी 'पवित्र मुस्लिम चिकित्सक" से सलाह लें। लेकिन तीन महीने से ज्यादा के भ्रूण का गर्भपात कराने को हराम बताया है। देवबंद ने हलाल आैर हराम संबंधी फतवों की श्रेणी में पूछे गए एक सवाल के जवाब में यह फतवा दिया है।


मुस्लिम संस्थान से पूछा गया है, 'हमारे दो बच्चे हैं। हमारा छोटा बच्चा लगभग 11 महीने का है। मेरी पत्नी एक बार फिर से गर्भवती है। चिकित्सक ने उसकी शारीरिक स्थिति को देखते हुए उसे अगले बच्चे के लिए लगभग 30 महीने का इंतजार करने को कहा है, इसलिए वह गर्भपात कराना चाहती है। क्या गर्भपात की इजाजत है ?" इसके जवाब में फतवा दिया गया है, 'अगर कोई पवित्र मुस्लिम चिकित्सक यह कहे कि महिला गर्भावस्था आैर प्रसव का दर्द सहन करने में सक्षम नहीं है, तो तीन महीने से कम के भूण का गर्भपात कराया जा सकता है, लेकिन अगर भूण तीन महीने से ज्यादा का हो, तो गर्भपात कराना पूरी तरह हराम है।"


हालांकि चिकित्सकों की दृष्टि में देवबंद का यह फतवा भी अनुचित है। चिकित्सकों का मानना है कि अगर कोई प्रशिक्षित चिकित्सक गर्भपात की सलाह देता है तो वह महिला की हालत देख कर ही इसके बारे में कहता है, जबकि 'नीम-हकीम" किसी महिला की हालत का बेहतर तरीके से अंदाज नहीं लगा सकते। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. फौजिया खानम कहती हैं, 'यह बात सही है कि तीन महीने से ज्यादा का भूण होने पर गर्भपात महिला के लिए खतरनाक साबित हो सकता है, लेकिन यह बात किसी तरह से गले नहीं उतरती कि तीन महीने से कम का भ्रूण होने पर भी हकीम की सलाह पर ही गर्भपात कराएं।"


डॉ. फौजिया परामर्श देती हैं कि अगर कोई अपने परिवार की महिला की जान को जोखिम में नहीं डालना चाहता, तो उसे महिला को किसी प्रशिक्षित चिकित्सक के पास ही ले जाना चाहिए। देवबंद ने इसके पहले अपने एक फतवे में कहा था कि गर्भधारण रोकने के लिए गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल भी हकीम से पूछ कर ही करना चाहिए। अगर हकीम इसकी इजाजत देता है, तो गर्भनिरोधक का इस्तेमाल हराम नहीं है ।


आज समाज न्यूज़ पेपर में ‘media-Input’

आज समाज न्यूज़ पेपर  में ‘media-Input’

शनिवार, फ़रवरी 05, 2011

थैंक ए मेल पर्सन डे पर खास

.... अब डाकिया नहीं लाते पैगाम



एक जमाना था जब किसी अपने का संदेश पाने को बेकरार निगाहें देहरी तक आने वाले रास्ते पर दूर तक टिकी रहती थीं। साइकिल की घंटी की आवाज कानों में पड़ते ही पैर रोके नहीं रुकते थे। खाकी वर्दी वाले डाकिए से अपनों का पैगाम पाकर मन मयूर नाच उठता था और  डाकिए को गुड़ के साथ ठंडा पानी या चाय के साथ मठरी खिलाकर उसका आभार प्रकट किया जाता था।

अब दौर बदल गया है। आज फेसबुक और  ई-मेल के जमाने में चिट्ठियों का चलन नहीं के बराबर रह गया है, लेकिन दूरदराज के गांव देहात में आज भी चिट्ठी लाने का काम डाकिया ही करता है। चिट्ठी से भी ज्यादा परदेस में नौकरी करने वाले बेटे का मनीआर्डर आए तो मां-बाप के चेहरे खिल जाते हैं। घूंघट की ओट से झांकती बहुरिया की आंखों में भी डाकिए के लिए आभार नजर आता है।

सर्दी, गर्मी, बरसात में हर तरह की दुष्वारियों के बीच साइकिल पर झोला टांगे हर रोज आने वाला डाकिया सिर्फ संदेशवाहक ही नहीं बल्कि सुख-दुख का साथी भी होता है और  शुक्रवार को डाकिए को धन्यवाद देने का दिन है।

गुरुवार, फ़रवरी 03, 2011

पर्यावरण को बचाने के प्रयास


आद्र्र भूमि में छिपे जीवन के राज
 
 दुनियाभर में पर्यावरण को बचाने के प्रयासों के तहत आद्र्र भूमि (वेटलैंड) संरक्षण सबसे अहम पहलू है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि जैवविविधता और भोजन श्रृंखला को सुचारू तौर पर चलाने का लक्ष्य वेटलैंड संरक्षण के बिना नहीं पाया जा सकता। हमारे देश में दलदल और मैंग्रोव के तौर पर आद्र्र भूमि मौजूद है, जिन्हें बचाने के लिए पर्यावरण कार्यकर्ता लगातार प्रयासरत हैं।

वेटलैंड किसी जलक्षेत्र के आसपास की आद्र्र भूमि को कहा जाता है। ऐसी भूमि सूखे की स्थिति में पानी को बचाने में मदद करते हैं। इतना ही नहीं बाढ़ के हालात में यह पानी का स्तर कम करने और  सूखी मिट्टी को बांध कर रखने में मददगार होते हैं। मुंबई और  दिल्ली जैसे महानगरों में ऐसी भूमि को सबसे तेजी से नुकसान पहुंच रहा है। जलस्रोत  के बहुत नजदीक तक निर्माण कार्य होने से आद्र्र भूमि के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

नियमानुसार किसी भी जलीय क्षेत्र के आसपास निर्धारित दूरी तक निर्माण कार्य नहीं होना चाहिए, लेकिन शहरों में तो जल के स्रोत  की छाती चीर कर भी इमारतें बनाई जा रही हैं। अगर अब भी हम नहीं चेते तो न तो हम सूखे से बच पाएंगे और न ही बाढ़ से। आद्र्र भूमि न केवल मनुष्य को प्राकृतिक आपदा के कहर से बचाता है, बल्कि वन्यजीवों के जीवन में भी इनका अहम स्थान है।

आद्र्र भूमि वन्य प्राणियों के लिए अहम 'फीडिंग, ब्रीडिंग  और ड्रिंकिंग " क्षेत्र हैं। ऐसी भूमि के नमूनों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि यह जैवविविधता और भोजन श्रृंखला का सबसे नायाब उदाहरण होता है। भारत के उड़ीसा महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे कई प्रदेशों में आद्र्र भूमि संरक्षण के लिए विभिन्न परियोजनाएं चल रहीं हैं, लेकिन इनका हश्र भी दूसरी सरकारी योजनाओं की तरह ही हो रहा है। अगर यही स्थिति रही तो हमारे पास जैवविविधता को दिखाने के लिए कोई साधन नहीं बचेगा।
विश्व वेटलैंड दिवस : हर साल दो फरवरी को मनाया जाता है। इसी दिन 1871 में ईरान के रामसर शहर में आद्र्र भूमि पर एक समझौते (कंवेंशन ऑन वेटलैंड) पर हस्ताक्षर हुए थे। इसके तहत दुनियाभर में जैवविविधता संरक्षण के लिए आद्र्र भूमि को बचाने के विभिन्न उपायों पर विचार-विमर्श हुआ। रामसर सम्मेलन में वेटलैंड को ऐसी दलदली भूमि के तौर पर परिभाषित किया गया था, जहां जलीय स्रोत का पानी स्थाई तौर पर संरक्षित रहता है। इस तरह नदियों तालाबों से लेकर समुद्रों तक के आसपास की भूमि वेटलैंड के दायरे में आती है।

बुधवार, फ़रवरी 02, 2011

आज समाज में ‘Input’

देश में हर चार मिनट में एक सुसाइड.....

देश में हर चार मिनट में कोई एक अपनी जान दे देता है। ऐसा करने वाले तीन लोगों में से एक युवा होता है। यानि देश में हर 12 मिनट में 30 वर्ष से कम आयु का एक युवा अपनी जान ले लेता है। ऐसा कहना है राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो का।






रविवार, जनवरी 30, 2011

पांच राज्यों में आगामी विधानसभा चुनाव

कांग्रेस : गठजोड़ के रोड़े


 पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु समेत देश के पांच राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों के लिहाज से क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन का मुद्दा कांग्रेस के लिए पेचीदा बना हुआ है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस एक तरह से खुद को प्रमुख पार्टी के तौर पर प्रदर्शित कर रही है। उधर 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में कठिनाई में आई द्रमुक की बात करें तो कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उनके पास तमिलनाडु में द्रमुक नीत गठजोड़ में शामिल होने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
ममता ने पिछले हफ्ते कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की थी, लेकिन दोनों नेताओं के बीच बातचीत के बारे में किसी भी तरफ से जानकारी नहीं दी गई। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव कुछ ही महीने बाद होने हैं और उनसे पहले नये साल में सोनिया-ममता की यह पहली मुलाकात है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि भी दिल्ली आ रहे हैं और वह अपने प्रदेश में गठबंधन पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से विचार विमर्श करेंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में चेन्नई में कहा था कि उनका गठबंधन मजबूत है।
तमिलनाडु के कांग्रेस नेता भी निजी तौर पर अलग धुन अलाप रहे हैं। उनका कहना है कि द्रमुक केंद्र की संप्रग सरकार में तीसरी सबसे बड़ी घटक पार्टी है। इसलिए कांग्रेस प्रदेश में अन्य किसी गठजोड़ के बारे में नहीं सोच सकती। एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'नेतृत्व चाहता है कि केंद्र सरकार सुरक्षित रहे आैर इसलिए हमें यह जानकर भी प्रदेश में द्रमुक के साथ रहना होगा कि वह 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में आलोचनाओं के घेरे में है।"
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस गठबंधन के लिए 294 में से 98 सीटें मांगने की प्रदेश कांग्रेस की योजना पर त्यौरियां चढ़ा ली हैं। इस मुद्दे पर प्रदेश के दोनों पार्टियों के नेताओं के बीच बहस सामने आ रही है।
इन दोनों प्रदेशों के अलावा केरल, असम और पुडुचेरी में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। केरल में कांग्रेस समान विचार वाले दलों के यूनाइटेड डेमोक्रेटिक  फ्रंट  की अगुवाई कर रही है और गत लोकसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बाद गठजोड़ इस बार काफी उत्साह में है। प्रदेश में इस गठजोड़ का चिर प्रतिद्वंद्वी सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक  फ्रंट  (एलडीएफ) है।
पुडुचेरी में कांग्रेस अपने दम पर सत्ता में है वहीं असम में यह बोडो दल के समर्थन से राज कर रही है। कांग्रेस महासचिव और  असम में पार्टी मामलों के प्रभारी दिग्विजय सिंह के अनुसार प्रदेश में गठबंधन के बारे में अभी तक कोई फैसला नहीं किया गया है। संकेत यह भी मिलता है कि पार्टी अपने दम पर ही किस्मत आजमा सकती है।

शनिवार, जनवरी 29, 2011

30 जनवरी : महात्मा गाँधी की पूरणतिथि......


...हिटलर के नाम बापू की पाती

पूरे जगत में सत्य, अहिंसा और भाईचारे का संदेश देते हुए अपना सर्वस्व बलिदान करने वाले बापू ने जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर को भी अहिंसा का पाठ पढ़ाया था और उनसे युद्ध का रास्ता छोड़ने का आग्रह किया था।

'महात्मा गांधी कम्प्लीट वक्र्स-वल्यूम 70" में प्रकाशित बापू के 23 जुलाई 1939 को लिखे पत्र में उन्होंने जर्मन तानाशाह को अहिंसा का महत्व समझाने का प्रयास किया था। बापू ने 24 दिसम्बर, 1940 को हिटलर को एक विस्तृत पत्र लिखा था, जब जर्मनी और इटली पूरे यूरोप पर कब्जा करने की ओर बढ़ रहे थे।


बापू पर शोध करने वाले डा. कोएनराद इल्स्ट ने अपनी पुस्तक में लिखा, महात्मा गांधी ने अपने पहले पत्र की शुरुआत में हिटलर को 'मित्र" रूप में संबोधित किया था। एक वर्ग के लोगों की आलोचना के बावजूद हिटलर को लिखे दूसरे पत्र में 'मित्र" संबोधन को स्पष्ट करते हुए कहा था, 'आपको मित्र संबोधन कोई औपचारिकता नहीं है। मैं पिछले 33 वर्षो से दुनिया में मानवता और बंधुत्व के प्रसार के लिए काम करता रहा हूं, चाहे वह किसी जाति, वर्ग, धर्म या रंग से जुड़ा क्यों न हो। मैं सार्वभौम बंधुत्व के सिद्धांत में विश्वास करता हूं।"


हिटलर को लिखे पत्र में महात्मा गांधी ने जर्मन तानाशाह की मदद से भारत की स्वतंत्रता के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। उन्होंने लिखा, 'हम कभी नहीं चाहेंगे कि देश में ब्रिाटिश शासन का खात्मा जर्मनी की मदद से हो, बल्कि अहिंसा ऐसा रास्ता है जो दुनिया की सबसे हिंसक शक्तियों के गठजोड़ को भी पराजित करने की क्षमता रखता है।"


हिटलर को लिखे पहले पत्र में बापू ने कहा, 'मेरे कई मित्र मुझसे मानवता के नाते आपको पत्र लिखने का आग्रह करते रहे हैं। लेकिन मैं उनके अनुरोध को ठुकराता रहा हूं, क्योंकि मुझे ऐसा लगता था कि मेरा आपको पत्र लिखना उचित नहीं होगा, लेकिन युद्ध की स्थिति को देखते हुए मैंने अपनी सोच को पीछे रखते हुए पत्र लिखा है।"
गांधी ने अपने दूसरे पत्र में जर्मन तानाशाह को लिखा, 'हम आपके हथियारों के सफल होने की कामना नहीं कर सकते। जिस प्रकार हम ब्रिाटेन के उपनिवेशवाद का विरोध करते हैं, उसी प्रकार से हम जर्मनी में नाज़ीवाद के भी विरोधी हैं। ब्रिाटेन का हमारा विरोध करने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हम ब्रिाटेन के लोगों को नुकसान पहुंचाना चाहते हों या युद्ध में पराजित करना चाहते हो। हम अहिंसा के रास्ते अपनी आजादी हासिल करना चाहते हैं।

शुक्रवार, जनवरी 28, 2011

-हर 12 मिनट में एक युवा करता है आत्महत्या

देश में हर चार मिनट में एक सुसाइड

देश में हर चार मिनट में कोई एक अपनी जान दे देता है। ऐसा करने वाले तीन लोगों में से एक युवा होता है। यानि देश में हर 12 मिनट में 30 वर्ष से कम आयु का एक युवा अपनी जान ले लेता है। ऐसा कहना है राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो का।


हाल ही में आए दुर्घटनाओं आैर आत्महत्या के कारण मौतों पर वर्ष 2009 के रेकार्ड के मुताबिक वर्ष 2009 में कुल 1,27,151 लोगों ने आत्महत्या की। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2009 में आत्महत्या के मामलों में 1.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2008 में आत्महत्या के 1,22,902 मामले थे जो वर्ष 2009 में बढ़कर 1,27,151 हो गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 'आत्महत्या करने वालों में 34.5 प्रतिशत की उम्र 15 से 29 साल के बीच थी, जबकि 34.2 प्रतिशत की उम्र 30 से 44 साल के बीच थी। दिल्ली और अरुणाचल प्रदेश में आत्महत्या करने वालों में 55 प्रतिशत से ज्यादा 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के थे।

इसके अनुसार, 'देश में रोज 223 पुरुष और 125 महिलाएं आत्महत्या करती हैं। इन महिलाओं में 69 घरेलू महिलाएं हैं। एक दिन में 73 लोग बीमारी के कारण और 10 लोग प्यार-मोहब्बत के चक्कर में आत्महत्या करते हैं।" 2009 में देश में सबसे ज्यादा आत्महत्याएं पश्चिम बंगाल में हुई। उसके बाद आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक में। इन पांच राज्यों में आत्महत्या करने वालों की कुल संख्या देश में आत्महत्या करने वालों की कुल संख्या का 55.1 प्रतिशत है। दक्षिण भारत के राज्यों आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल को मिला कर देश में कुल आत्महत्या का 32.2 प्रतिशत इन्हीं राज्यों में होता है। वर्ष 2009 में दिल्ली में 1,477 लोगों ने आत्महत्या की । वहीं उत्तर प्रदेश में आत्महत्या करने वालों की संख्या काफी कम रही।

देश में 23.7 प्रतिशत लोग पारिवारिक परेशानी और 21 प्रतिशत बीमारियों के कारण आत्महत्या करते हैं। प्यार-मोहब्बत के चक्कर में सिर्फ 2.9 प्रतिशत और दहेज झगड़ों, ड्रग्स और गरीबी के कारण 2.3 प्रतिशत लोग आत्महत्या करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 'पुरूष सामाजिक और आर्थिक परेशानियों के कारण तथा महिलाएं व्यक्तिगत और भावनात्मक कारणों से आत्महत्या करती हैं।"

रिपोर्ट के रोचक तथ्य
-1999 के मुकाबले 2009 में आत्महत्याओं की संख्या में 15 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
-1999 में 1,10,587 लोगों ने और  2009 में 1,27,151 लोगों ने आत्महत्या की।
-आत्महत्या करने वालों में पुरूष स्त्री का अनुपात 64:36 था।
-14 साल की उम्र तक के बच्चों में लड़का और लड़की का अनुपात 51:49 रहा।
-45.8 प्रतिशत पुरूष तथा 24.6 प्रतिशत विवाहित महिलाओं ने की आत्महत्या।
-केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में आत्महत्या करने वालों में से 54.7 प्रतिशत 60 वर्ष से ज्यादा उम्र के थे।
-कुल 2,951 बच्चों ने आत्महत्या की। इनमे से 54.5 प्रतिशत मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और तमिलनाडु में हैं।
-43.3 प्रतिशत आत्महत्याएं चार बड़े शहरों बंगलुरू, चेन्नई, दिल्ली और मुंबई में हुई।


आत्महत्या मामलें में शीर्ष राज्य
-पश्चिम बंगाल : 14,648
-आंध्रप्रदेश : 14,500
-तमिलनाडु 14,424
- महाराष्ट्र 14,300
-कर्नाटक 12,195


आत्महत्या के कारण
33.6 प्रतिशत : जहर खा कर
31.5 प्रतिशत : फांसी लगाकर
9.2 प्रतिशत : आत्मदाह करके
6.1 प्रतिशत : पानी में डूब कर


व्यावसायिक : 1,354
बेरोजगारी : 2,472

शनिवार, जनवरी 15, 2011

१६ जनवरी : धार्मिक स्वतंत्रता दिवस



भारत की धार्मिक सहिष्णुता की दुनिया देती है दाद
दुनियाभर में आधुनिकता आैर सहिष्णुता की शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद मजहबी कट्टरपन बढ़ रहा है। धार्मिक स्वतंत्रता पर हमले हो रहे हैं। हालांकि, भारत कभी कभार धर्म के नाम पर दंगे हो जाते हैं, लेकिन इनके पीछे धार्मिक स्वतंत्रता को दबाने का उद्देश्य नहीं होता। आज पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सूडान, इराक, यमन, नाइजीरिया आैर इनके अतिरिक्त बहुत से मुल्कों में हिंसा चरम पर है। इसके पीछे कहीं न कहीं धार्मिक कट्टरपन जिम्मेदार है।
अमेरिका जैसा देश भी भारत की धार्मिक सहिष्णुता को बेमिसाल मानता है। विकीलीक्स द्वारा सार्वजनिक किए गए एक गोपनीय अमेरिकी राजनयिक संदेश से भी विदेशों में भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि स्पष्ट हो जाती है। नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास से 2006 में भेजे गए इस राजनयिक संदेश में कहा गया था कि अमेरिका भारत की धर्म निरपेक्षता से सीख ले सकता है, जहां बहुधर्मीय बहु संस्कृति आै बहु जातीय समाज है तथा ये सभी स्वतंत्रता के साथ जीते हैं आैर अपने धार्मिक कार्यकलापों को स्वतंत्र होकर संपन्न करते हैं।


अप्रैल 2006 में भेजे गए इस संदेश को गार्जियन अखबार ने प्रकाशित किया जिसमें भारत की धर्म निरपेक्ष प्रकृति आैर धार्मिक सहिष्णुता की जमकर तारीफ की गई। इसमें कहा गया कि आज जब बहुत से देशों में धर्म के नाम पर चरमपंथ बढ़ रहा है, ऐसे में भारत सही दिशा की ओर अग्रसर है। धार्मिक स्वतंत्रता निगरानी समिति ने हाल ही में भारत में भी धार्मिक स्वतंत्रता का अध्ययन किया आैर कहा कि इस मामले में कुल मिलाकर भारत की स्थिति अच्छी है।


समिति ने कहा कि भारत के लोग उदार हैं आैर अल्पसंख्यक निर्भीक होकर अपने धर्म का पालन करते हैं। उनकी धार्मिक स्वतंत्रता पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं है। निगरानी समिति ने हालांकि यह भी कहा कि कुछ राज्य सरकारें धर्म परिवर्तन विरोधी कानून बनाकर धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करने की कोशिश करती हैं।



गुरुवार, जनवरी 13, 2011

एक पर्व, नाम अनेक


संक्रांति संस्कृत का शब्द है, जो सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश बताता है। भारत में मनाए जाने वाले पर्वों में यह एकमात्र ऐसा पर्व है, जो सौर कैलेंडर पर आधारित है। इसकी वजह से यह पर्व हर साल 14 जनवरी को हर मनाया जाता है। शेष सभी पर्व चंद्र कैलेंडर पर आधारित होते हैं।


वैज्ञानिक फैक्टर : हिंदू ज्योतिष के अनुसार, कुल बारह राशियां होती हैं। इस प्रकार संक्रांति भी 12 हुईं। लेकिन मकर संक्रांति तब मनाई जाती है, जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। देश में मनाए जाने वाले अन्य पर्वों की तारीख बदलती रहती है, क्योंकि वह चंद्र कैलेंडर पर आधारित होते हैं आैर चंद्रमा की गति सूर्य की तुलना में अधिक होती है।  दरअसल, पृथ्वी को कर्क आैर मकर रेखाएं काटती हैं। जब सूर्य कर्क रेखा को पार करता है तो पृथ्वी के आबादी वाले हिस्से में उसका प्रकाश कम आता है। इसी दौरान धनु में सूर्य का संचार होने पर सर्दी अधिक हाती है, जबकि मकर में सूर्य का संचार होने पर सर्दी कम होने लगती है। मकर संक्राति से गर्मी तेज होने लगती है। उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद, वाराणसी आैर हरिद्वार में गंगा के घाटों पर तड़के ही श्रद्धालु पहुंच कर स्नान करते हैं। उत्तराखंड में इस पर्व की खास धूम होती है। इस दिन गुड़, आटे आैर घी के पकवान पकाए जाते हैं आैर इनका कुछ हिस्सा पक्षियों के लिए रखा जाता है।


मकर संक्रांति भारत के अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस पर्व को 'तिलगुल" कहा जाता है। महाराष्ट्र में इस पर्व पर घर के लोग सुबह पानी में तिल के कुछ दाने डाल कर नहाते हैं। महिलाएं रंगोली सजाती हैं आैर पूजा की जाती है। पूजा की थाली में तिल जरूर रखा जाता है। इसी थाली से सुहागन महिलाएं एक दूसरे को कुंकुम, हल्दी आैर तिल का टीका लगाती हैं। हल्दी कुंकुम का सिलसिला करीब 15 दिन चलता है।


'सिख मकर संक्रांति को माघी कहते हैं। इस दिन उन 40 सिखों के सम्मान में सिख गुरुद्वारे जाते हैं जिन्होंने दसवें गुरू गोविंद सिंह को शाही सेना के हाथों पकड़े जाने से बचाने के लिए अपनी कुर्बानी दी थी। इस दिन यहां खीर जरूर बनती है। हिमाचल प्रदेश आैर हरियाणा में भी माघी की धूम होती है।


बिहार में 14 जनवरी को सकरात मनाई जाती है। इस दिन लोग सुबह सवेरे स्नान के बाद पूजा करते हैं। इसके अगले दिन यहां मकरात मनाई जाती है, जिस दिन खिचड़ी का सेवन किया जाता है। बुंदेलखंड आैर मध्यप्रदेश में भी इस पर्व को सकरात कहा जाता है। गुजरात में यह पर्व दो दिन मनाया जाता है। 14 जनवरी को उत्तरायण आैर 15 जनवरी को वासी उत्तरायण। दोनों दिन पतंग उड़ाई जाती है।


मकर संक्रांति को कर्नाटक में सुग्गी कहा जाता है। इस दिन यहां लोग स्नान के बाद संक्रांति देवी की पूजा करते हैं, जिसमें सफेद तिल खास तौर पर चढ़ाए जाते हैं। पूजा के बाद ये तिल लोग एक दूसरे को भेंट करते हैं। केरल के सबरीमाला में मकर संक्र ांति के दिन मकर ज्योति प्रज्ज्वलित कर मकर विलाकू का आयोजन होता है। यह 40 दिन का अनुष्ठान होता है, जिसके समापन पर भगवान अयप्पा की पूजा की जाती है।



उड़ीसा में मकर संक्रांति को मकर चौला आैर पश्चिम बंगाल में पौष संक्रांति कहा जाता है। असम में यह पर्व बीहू कहलाता है। यहां इस दिन महिलाएं आैर पुरुष नए कपड़े पहन कर पूजा करते हैं आैर ईश्वर से धनधान्य से परिपूर्णता का आशीर्वाद मांगते हैं। गोवा में इस दिन वर्षा के लिए इंद्र देवता की पूजा की जाती है ताकि फसल अच्छी हो। आंध्र प्रदेश में भी यह पर्व चार दिन मनाया जाता है। पहले दिन 'भोगी" दूसरे दिन 'पेड्डा पांडुगा" (मकर संक्रांति) तीसरे दिन कनुमा आैर चौथे दिन मुक्कानुमा मनाया जाता है। भोगी के दिन घर का पुराना आैर अनुपयोगी सामान निकाला जाता है आैर शाम को उसे जलाया जाता है


थाई माह की शुरुआत
तमिलनाडु में यह पर्व पोंगल कहलाता है। इस दिन से तमिलों के थाई माह की शुरुआत होती है। इस दिन तमिल सूर्य की पूजा करते हैं। उनसे अच्छी फसल के लिए आशीर्वाद मांगते हैं। यह पर्व राज्य में चार दिन मनाया जाता है।

गुरुवार, जनवरी 06, 2011

आंध्रप्रदेश : तनाव की चपेट में

दक्षिणी राज्य आंध्रप्रदेश में अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर गठित श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी गई है.







श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट


-आंध्रप्रदेश को ज्यों का त्यों एक संगठित राज्य रखा जाए.
-सीमांध्रा और तेलंगाना में विभाजित किया जाए और हैदराबाद को केंद्र प्रशासित बनाया जाए.
-रायल तेलंगाना और तटीय आंध्र क्षेत्र में विभाजन किया जाए, जिसमें हैदराबाद, रायल तेलंगाना का हिस्सा हो.
-सीमांध्रा और तेलंगाना में विभाजित किया जाए जिसमें हैदराबाद महानगर को एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाए. इस केंद्र शासित प्रदेश में तीन ज़िलों रंगा रेड्डी, महबूबनगर और नलगोंडा को शामिल किया जाए.
-सीमांध्रा और तेलंगाना की मौजूदा सीमाओं को बरकरार रखते हुए विभाजित किया जाए, जिसमें हैदराबाद तेलंगाना की राजधानी हो और सीमांध्रा की नई राजधानी बनाई जाए.
-राज्य को एक रखा जाए, साथ ही तेलंगाना क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास और राजनैतिक सशक्तिकरण के लिए कुछ संवैधानिक और वैधानिक क़दम उठाए जाएं और तेलंगाना क्षेत्रीय काउंसिल का गठन किया जाए.

आंध्रप्रदेश इस समय आशा और आशंका की मिली जुली भावनाओं और तनाव की चपेट में है. प्रदेश का बँटवारा करके अलग तेलंगाना राज्य बनाने की मांग पर विचार के लिए बनाई गई श्रीकृष्ण समिति ने जब अपनी रिपोर्ट केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम को सौंपी तो राज्य दम साधे ये प्रतीक्षा कर रहा था कि इस पर किस तरह की प्रतिक्रिया सामने आएगी. क्योंकि इस समिति की रिपोर्ट का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया है और कोई यह नहीं जानता की समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा क्या है, कोई भी अभी इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता.


बुधवार, जनवरी 05, 2011

आहत मीरा


सदन के सुचारू संचालन के लिए लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार गुजरे वर्ष के तीनों सत्रों में सदस्यों से बार-बार अपील करती रहीं, लेकिन सांसदों के कानों पर जूं नहीं रेंगी। संसद में व्यवधान तथा जबरन स्थगन के चलते न केवल 269 घंटे का समय व्यर्थ गवांया गया, बल्कि अरबों रुपए की करदाताओं की गाढ़ी कमाई को भी स्वाहा कर दिया...

रविवार, जनवरी 02, 2011

2010 : संसद का लेखाजोखा

सालभर आहत रहीं मीरा

सदन के सुचारू संचालन के लिए लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार गुजरे वर्ष के तीनों सत्रों में सदस्यों से बार-बार अपील करती रहीं, लेकिन सांसदों के कानों पर जूं नहीं रेंगी। संसद में व्यवधान तथा जबरन स्थगन के चलते न केवल 269 घंटे का समय व्यर्थ गवांया गया, बल्कि अरबों रुपए की करदाताओं की गाढ़ी कमाई को भी स्वाहा कर दिया। संसद के बजट सत्र, मानसू़त्र सत्र आैर शीतकालीन सत्र को मिलाकर वर्ष भर में कुल 80 बैठकें हुई। इनमें से व्यवधान आैर स्थगन के चलते 27 दिन कोई कामकाज नहीं हुआ। इस प्रकार लोकसभा ने 33 फीसदी यानी करीब एक तिहाई समय बर्बाद कर दिया।


बजट सत्र : बजट सत्र में लोकसभा की 32 बैठकें हुई, जिनकी कुल अवधि 137 घंटे तथा 51 मिनट थी। सरकार ने 27 विधेयक पेश किए आैर 21 विधेयक पारित किए गए, लेकिन बजट सत्र के दूसरे चरण में 17 दिन में से केवल नौ दिन ही प्रश्नकाल हो सका। शुरुआत से ही सदस्यों से सदन को सुचारू रूप से चलाने की बार-बार अपील करने वाली स्पीकर मीरा कुमार ने इस बात पर बेहद चिंता जताई थी कि लगातार व्यवधान के चलते प्रश्नकाल प्रभावित हुआ है। उन्होंने बेहद आहत स्वर में कहा था कि इस प्रकार का व्यवधान संसद जैसी महत्वपूर्ण संस्था को अप्रासंगिक बना देगा।


मानसून सत्र : 26 जुलाई से शुरू होकर 31 अगस्त तक चले संसद के मानसून सत्र में भी कामकाज की कमोबेश यही स्थिति रही। 136 घंटे तथा 10 मिनट की समयावधि में सिमटी लोकसभा की 26 बैठकों में से 11 दिन प्रश्नकाल बाधित हुआ। सूचीबद्ध 460 तारांकित सवालों में से केवल 46 सवालों के ही सदन में जवाब दिए जा सके। इस प्रकार मौखिक प्रश्नों का आैसत बजट सत्र में 2.37 सवाल प्रतिदिन से आैर नीचे गिरकर 1.91 पर पहुंच गया। मानसून सत्र में महंगाई, पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि, कॉमनवेल्थ गेम्स आैर अवैध खनन को लेकर विपक्ष ने भारी हंगामा किया। इस सत्र में भी स्पीकर ने यहां तक कहा, 'राजनीतिक दलों आैर सदस्यों को निजी तौर पर संसदीय लोकतंत्र को हो रही इस क्षति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। हम यहां अनगिनत देशभक्त भारतीयों के बलिदानों की बदौलत बैठे हैं। मैं सभी संंबंधित पक्षों से अपील करती हूं कि सदन की गरिमा की रक्षा करें।" लेकिन बजट सत्र आैर मानसून सत्र में की गई स्पीकर की इन अपीलों का सदस्यों पर कोई असर नहीं हुआ।


शीतकालीन सत्र : 2 जी स्पैक्ट्रम पर बना गतिरोध सत्र की समाप्ति तक बरकरार रहा। इस पर हुए हंगामे के कारण करदाताओं की करीब डेढ़ अरब रुपए रही की गाढ़ी कमाई पर पानी फिर गया। 2 जी स्पैक्ट्रम, आदर्श हाउसिंग सोसायटी आैर कॉमनवेल्थ गेम्स के घोटालों के मामलों की संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराने पर अड़े विपक्ष के हंगामे के कारण नौ नवम्बर से शुरू हुए शीतकालीन सत्र में कोई खास कामकाज नहंी हुआ।


बैठकें स्थगित, गाढ़ी कमाई स्वाहा


-एक सत्र की एक दिन की कार्रवाई पर 7.65 करोड़ रुपए का खर्च
-संसद के बजट सत्र, मानसू़त्र सत्र आैर शीतकालीन सत्र को मिलाकर वर्ष भर में कुल 80 बैठकें हुई।


-इनमें से व्यवधान आैर स्थगन के चलते 27 दिन कोई कामकाज नहीं हुआ। लोकसभा में 33 फीसद समय व्यर्थ

-2010 : लोकसभा में 33 फीसदी यानी करीब एक तिहाई समय बर्बाद हुआ

-बजट सत्र : 69 घंटे आैर 51 मिनट का समय गंवाया

-मानसून सत्र : 45 घंटों के अमूल्य समय पर पानी फिर गया।

-शीतकालीन सत्र : 23 दिन में से 22 दिन की कार्यवाही ही नहीं हुई।


-पूरे सत्र में 620 तारांकित प्रश्न सूचीबद्ध थे, लेकिन केवल 76 सवालों का ही मंत्री प्रश्नकाल में जवाब दे पाए। कुछ खास


-इस प्रकार आैसतन प्रतिदिन 2.37 सवालों को ही प्रश्नकाल में लिया गया।

शुक्रवार, दिसंबर 31, 2010

2011 होगा शताब्दी का अनूठा वर्ष

नव वर्ष 2011 इस दृष्टि से शताब्दी का अनूठा वर्ष है कि इसके एक दिन की तिथि, माह तथा वर्ष की संख्याओं से एक के अंक का छक्का लगता है।

यह तिथि है 11 नवम्बर, 2011 जब तिथि माह एवं वर्ष को 11-11-11 के रूप में दर्शाया जाएगा। ऐसी स्थिति शताब्दी में केवल एक बार आती है। इस वर्ष के कुल चार दिनों की तिथि-माह तथा वर्ष सभी में केवल एक का अंक रहेगा। इसकी शुरुआत वर्ष के पहले दिन एक जनवरी 1-1-11 से हो रही है। एक के अंक के छह बार आने की युति पिछली बार 1911 की इसी तिथि को थी आैर अगली बार सन 2111 में होगी। अत: इसे शताब्दी युति कहा जा सकता है।


इससे पहले चार युतियों के मामले में 2001 में भी स्थिति 2011 के निकट थी, किन्तु अंतर यह था कि तब चारो युतियों में एक के अंक की आवृत्ति 2011 के मुकाबले एक एक कम थी। यानी 11 नवम्बर को अधिकतम आवृति पांच ही थी 11-11-1 अगली बार दो फरवरी 2022 को तिथि, माह एवं वर्ष को 2-2-22 के रूप में दर्शाया जाएगा। वर्ष 2022 में दो की संख्या की अधिकतम पांच आवृत्तियां 22 फरवरी 22-2-22 को होगी। उस वर्ष केवल एक ही संख्या यानी दो से बनने वाली तिथि, माह एवं वर्ष की युति केवल इन्हीं दो दिनों में देखने को मिलेगी। इस प्रकार केवल एक संख्या से चार बार उपर्युक्त युतियां 2001 के बाद 2011 में ही बन रही है, जबकि अधिकतम छह बार उसी संख्या यानी एक की आवृत्ति होना तो 2011 को शताब्दी का अनूठा वर्ष ही बना देता है।


इस पूरी शताब्दी में एक ही अंक की आवृत्तियों से बनने वाली ऐसी युतियां इस प्रकार है-

 
         तिथि                               युति

  • -1 जनवरी, 2001                           1-1-1


  • -11 जनवरी, 2001                          11-1-1


  • -1 नवम्बर, 2001                             1-11-1


  • -11नवम्बर, 2001                           11-11-1


  • -2 फरवरी, 2002                               2-2-2


  • -22 फरवरी, 2002                            22-2-2


  • -3 मार्च, 2003                                      3-3-3


  • -4 अप्रैल, 2004                                   4-4-4


  • -5 मई, 2005                                       5-5-5
                      
  • -6 जून, 2006                                      6-6-6


  • -7 जुलाई, 2007                                  7-7-7


  • -8 अगस्त, 2008                                8-8-8


  • -9 सितम्बर, 2009                             9-9-9





2011

  • -1 जनवरी, 2011                                1-1-11

  • -11 जनवरी, 2011                              11-1-11


  • -1 नवम्बर, 2011                               1-11-11

  • -11 नवम्बर, 2011                             11-11-11

2022


  • -2 फरवरी, 2022                                2-2-22


  • -22 फरवरी, 2022                            22-2-22


  • -3 मार्च 2033                                   3-3-33


  • -4 अप्रैल, 2044                                4-4-44


  • -5 मई, 2055                                     5-5-55


  • -6 जून, 2066                                    6-6-66


  • -7 जुलाई, 2077                                7-7-77


  • -8 अगस्त 2088                               8-8-88


  • -9 सितम्बर, 2099                            9-9-99

शनिवार, दिसंबर 25, 2010

2010 : कुछ उजले, कुछ स्याह अक्स

2010 : कुछ उजले, कुछ स्याह अक्स
भ्रष्टाचार आैर रिश्वतखोरी जैसे आरोपों के बीच देशवासियों के लिए इस वर्ष कुछ खबरें राहत देने वाली भी रहीं हैं। मसलन भारत में शराब पीने वालों की तादाद दुनिया के कई देशों से काफी कम आंकी गई। बेंगलुरू का आईआईएम विश्व के शीर्ष 25 प्रबंधन संस्थानों में शामिल किया गया। जयपुर के एक थाने को एशिया का सर्वश्रेष्ठ थाना करार दिया गया। जाते बरस में भारत इसी तरह के अच्छे बुरे कई कारणों से खबरों में रहा है।
उजले अक्स

वेधशाला ने बढ़ाया नाम : राजस्थान के जयपुर में 18वीं सदी में निर्मित खगोलीय वेधशाला को यूनेस्को ने इस साल विश्व विरासत स्थल का दर्जा दे दिया।
वेधशाला का निर्माण महाराजा जयसिंह द्वितीय ने वर्ष 1727 से वर्ष 1734 के दौरान कराया था।


मैसूर भी रहा सुर्खियों में : 'महलों के शहर" के नाम से मशहूर मैसूर को न्यूयार्क टाइम्स ने इस साल घूमने के लिए 31 सबसे अच्छे शहरों की सूची में चौथे पायदान पर रखा। इस सूची में 13 वें स्थान पर मुंबई है।


बेहतर रहा आईआईएम बेंगलुरू : फ्र ंस के वार्षिक सर्वेक्षण में भारतीय प्रबंधन संस्थान बेंगलुरू (आईआईएम-बी) को विश्व के शीर्ष 25 बिजनेस स्कूलों में शुमार किया गया। इसे 24वें पायदान पर रखा गया है। आईआईएम अहमदाबाद को 55वें पायदान पर रखा गया है।


विधायकपुरी थाना श्रेष्ठ : विश्व में सार्वजनिक सुरक्षा, न्याय आैर मानवाधिकार क्षेत्र में काम करने वाली न्यूयार्क की संस्था एटलस ग्लोबल एलियांस ने गुलाबी नगरी जयपुर के विधायकपुरी थाने को इस साल एशिया का सर्वश्रेष्ठ पुलिस थाना चुना है।


धूम्रपान निषेध की उजली तस्वीर : ब्रिाटेन के एक सर्वेक्षण के हवाले से लिखा है कि मदिरापान में ब्रिाटेन के लोग सबसे आगे हैं, जबकि भारतीय सबसे कम शराब पीते हैं। इनमें 27 प्रतिशत लोग तो ऐसे हैं, जिन्होंने शायद ही कभी शराब को हाथ लगाया हो।


महिलाओं की हालत में बेहतर सुधार : सेंटर फॉर वर्क लाइफ पालिसी की दिसम्बर में जारी रिपोर्ट 'बैटल ऑफ फीमेल टैलेंट इन इंडिया" मंे कहा गया है कि 80 प्रतिशत भारतीय महिलाएं अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए हर समय कुछ नया कर गुजरने को तैयार रहती हैं। अमेरिकी महिलाओं के लिए यह आंकड़ा 52 प्रतिशत है।

 
धंुधले अक्स


रिश्वत देने में नंबर वन : बर्लिन की गैर सरकारी एजेंसी ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (टीआई) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2010 में सबसे ज्यादा रिश्वत अफगानिस्तान, कंबोडिया, कैमरून, भारत, इराक, लाइबेरिया, नाइजीरिया, फलस्तीन, सेनेगल, सियरा लियोन आैर युगांडा में दी गई। भारत में 54 फीसदी लोगों ने अपने कार्यों के लिए रिश्वत दी।


'डर्टी डॉजन" में दूसरे स्थान पर भारत : कंप्यूटर सुरक्षा कंपनी सोफोस ने 29 अप्रैल को अपनी रिपोर्ट में बताया कि भारत दुनिया भर में स्पैम या जंक मेल भेजने वाले 'डर्टी डॉजन" में दूसरे स्थान पर है। 'पांडा लैब्स" के एक अध्ययन के मुताबिक, दुनिया भर में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों के पास जो 'स्पैम" यानी अवांछित ई-मेल आते हैं उनमें दूसरी सबसे ज्यादा हिस्सेदारी भारत की होती है।


भारतीय संसद : हंगामे का नया इतिहास

 पिछले कई सालों की तरह इस साल भी संसद के सत्रों में  हंगामा, व्यवधान  स्थगन का सिलसिला जारी रहा, लेकिन इस महीने 13 तारीख को संपन्न शीतकालीन सत्र का पहला दिन छोड़ कर पूरा की पूरा हंगामे की भेंट चढ़ जाने से भारतीय संसद का एक नया इतिहास लिखा गया।
-आंकड़ें बताते हैं कि शीतकालीन सत्र 1985 में आठवीं लोकसभा से संपन्न पिछले 82 सत्रों में पहला ऐसा सत्र था जिसमें संसद के निचले सदन लोकसभा ने 22 बैठकों के उपलब्ध समय में से मात्र सात घंटे 37 मिनट यानी 5.5 फीसदी आैर राज्यसभा ने मात्र दो घंटे 44 मिनट यानी 2.4 फीसदी समय का ही उपयोग किया, जबकि बाकी का सारा समय 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले पर संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की विपक्ष की मांग के हंगामे की भेंट चढ़ गया।
-इस पूरे साल संसद का अधिकांश कामकाजी समय हंगामे की भेंट चढ़ा तो वहीं सांसदों द्वारा खुद अपने वेतन भत्ते बढाने संबंधी विवादास्पद विधेयक को पारित किए जाने की भी मीडिया में काफी चर्चा रही।
- इस वर्ष राज्यसभा द्वारा महिला आरक्षण संबंधी विधेयक को पारित किया जाना एक बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है। हालांकि लोकसभा में पारित नहीं हो सकने के कारण यह लागू नहीं हो सका।
-संसदीय कामकाज के लिहाज से वर्ष की शुरुआत ही काफी निराशाजनक रही। 22 फरवरी से शुरू होकर सात मई तक चले बजट सत्र में मात्र तीन मंत्रालयों की अनुदानों की अनुपूरक मांगों पर चर्चा की गई, जबकि बाकी सभी मंत्रालयों की अनुदान की अनुपूरक मांगों तथा अन्य विधायी कामकाज को गिलोटिन के जरिए निपटाया गया।
- संसद के दोनों सदनों में बजट सत्र में सरकार ने 27 विधेयकों को पारित कराने की योजना बनाई थी, लेकिन मात्र छह विधेयकों को ही पारित किया जा सका। बजट सत्र में लोकसभा में 12 विधेयक पारित किए गए। इसमें से पांच विधेयकोें पर 15 मिनट से भी कम समय की चर्चा कराई गई। इनके अलावा, 31 अगस्त को समाप्त हुए संसद के मानसून सत्र में सांसदों के वेतन वृद्धि आैर परमाणु दायित्व विधेयक पारित किए गए। दोनों ही विधेयक काफी चर्चित रहे।
- इस सत्र में सरकार ने दोनों ही सदनों में 35 विधेयक पेश करने की योजना बनाई थी लेकिन 23 विधेयक ही पेश किए जा सके। 33 विधेयकों को पारित कराने की योजना के स्थान पर केवल 21 विधेयकों को पारित किया गया। भारतीय संसद के इतिहास में यह अब तक का सबसे लंबा गतिरोध था।
- 1987 में बोफोर्स मामले में जेपीसी की मांग पर संसद में 45 दिन हंगामा हुआ था, लेकिन तब भी इस बार की तरह संसद का कामकाज पूरी तरह ठप नहीं हुआ था। संसद के इस सत्र के दौरान कायम रहे गतिरोध पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी गहरी चिंता जताते हुए कहा था कि उन्हें संसदीय प्रणाली के भविष्य को लेकर ही चिंता हो रही है।

सोमवार, अक्टूबर 04, 2010

दिल्ली : द बेस्ट

04 अक्टूबर: विश्व पर्यावास दिवस पर विशेष
सीआईआई आैर इंस्टीट्यूट ऑफ कम्पीटेटिवनेस इंडिया के इस सूचकांक के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली रहने की दृष्टि से देश के अन्य महानगरों आैर नगरों की तुलना में शीर्ष पर है।      दिल्ली के बाद क्रमश: मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरू, कोलकाता, हैदराबाद आैर अहमदाबाद का स्थान हैं।
 सूचकांक के अनुसार सामाजिक राजनीतिक माहौल की दृष्टि से मुंबई सबसे ऊपर है। उसके बाद क्रमश: दिल्ली, कोलकाता, गोवा आैर चेन्नई का स्थान आता है। शिक्षा एवं आर्थिक माहौल की दृष्टि से भी दिल्ली सबसे आगे है, जबकि भुवनेश्वर, गुवाहाटी, जयपुर, कानपुर, लखनऊ, पटना आैर वड़ोदरा इस मोर्चे पर सबसे पीछे हैं।
इस वर्ष विश्व पर्यावास दिवस का ध्येय वाक्य 'बेहतर शहर, बेहतर जनजीवन" है। निवास योग्य सूचकांक 2010 के अनुसार जनसांख्यिकी, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा, सुरक्षा, आवास, सामाजिक एवं सास्कृतिक राजनीतिक माहौल, आर्थिक विकास, प्राकृतिक एवं नियोजित पर्यावरण जैसे आठ मानकों के आधार पर 37 शहरों की सूची में दिल्ली शीर्ष पर है।
 सघन आबादी वाली इस दिल्ली में प्रति किलोमीटर क्षेत्र में करीब छह हजार से अधिक लोग (1991 के आंकडे़ के अनुसार) निवास करते हैं। हालांकि दिल्ली का एक चेहरा आैर भी है। यहां बड़ी संख्या में झुग्गी बस्तियां आैर अनधिकृत कॉलोनियां भी हैं, जहां जनजीवन उतना अच्छा नहीं है। इन कॉलोनियांें में बिल्कुल सटे-सटे मकान हैं, सीवर लाइन, पार्क आदि की कमी है।

क्या है पर्यावास दिवस
 पर्यावास दिवस हर वर्ष अक्टूबर के पहले सोमवार को मनाया जाता है। यह दिवस शहरों आैर नगरों की स्थिति तथा सभी को मूल अधिकार खासकर पर्याप्त आश्रय पर बल देता है। यह दुनिया को मानव पर्यावास के भविष्य के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी का भी एहसास दिलाता है। यह दिवस सन 1986 से मनाया जा रहा है।


'पर्यावास दिवस हमें वार्षिक अवसर प्रदान करता है कि हम अपने शहरों आैर नगरों को कैसे सभी के लिए बेहतर स्थान बना सकते हैं"
                                             बान की मून (संयुक्त राष्ट्र महासचिव)

शनिवार, अक्टूबर 02, 2010

बिना घर के गृहमंत्री

जन्मदिवस 02 अक्टूबर पर विशेष
बिना घर के गृहमंत्री       
 ऐसे समय जब नेता सरकारी सुविधाएं हासिल करने के लिए मारामारी करते रहते हैं, आपको यह जानकर अचरज होगा कि देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जब गृहमंत्री थे तो उनके पास अपना मकान तक नहीं था। वह  इलाहाबाद में किराए के मकान में रहा करते थे। इस कारण लोग उन्हें  'बिना मकान का गृहमंत्री'  कहा करते थे।

दो अक्टूबर को 1904 को वाराणसी के मुगल सराय कस्बे में एक किसान परिवार में शास्त्री जी का जन्म हुआ। उनके पिता शारदा प्रसाद एक गरीब अध्यापक थे। बाद में उन्होंने इलाहाबाद के राजस्व विभाग में कलर्क  के रूप में काम किया। उनकी माता का नाम राम दुलारी था। शास्त्री जी के बचपन का नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था। जब वह एक वर्ष के थे तो उनके पिता का निधन हो गया। उनका आैर उनके भाई-बहनों का पालन-पोषण उनकी मां दुलारी देवी ने किया। उनके दादा हजारीलाल उन्हें प्यार से 'नन्हें" पुकारते थे। लालबहादुर बचपन से ही सच्चे, ईमानदार आैर जिम्मेदार प्रवृत्ति के थे।

एक बार की घटना है, जब वह छह वर्ष के थे तो उनके मित्र एक बाग में फल तोड़ने के लिए उन्हें भी साथ ले गए, जब उनके मित्र फल तोड़ रहे थे तो बगीचे का चौकीदार आ गया। इस पर पेड़ पर चढे़ उनके सभी मित्र भाग गए, लेकिन वह वहीं खडे़ रहे। चौकीदार ने उन्हें पकड लिया। उन्हें पीटने लगा। तब उन्होंने कहा, मुझे मत मारों मैं अनाथ हूं। मैंने कुछ नहीं किया है। मैं झूठ नहीं बोल रहा हूं। मैंने तुम्हारे बाग को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है। इस पर चौकदार ने कहा, मैं जानता हूं कि तुम झूठ नहीं बोल रहे हो, लेकिन तुम्हें अपने व्यवहार में सुधार करना चाहिए। इससे दूसरों को कष्ट न पहुंचे।

रेलवे स्कूल में चौथी कक्षा तक पढ़ाई के बाद शास्त्री ने बनारस के हरिश्चंद हाई स्कूल में शिक्षा आरम्भ की। अपनी पढ़ाई के लिए उन्हें गंगा नदी के पार जाना पड़ता था। एक बार नाव के किराए के लिए पैसे नहीं होने पर शर्मिदंगी से बचने के लिए अपने मित्रों को बिना बताए नाव के जाने के बाद उन्होंने गंगा नदी को तैरकर पार किया।   शास्त्री जी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से इतना प्रभावित थे कि वह उनका भाषण सुनने के लिए बनारस से 50 मील दूर गांव तक जा पहुंचे। तिलक के भाषण पर उनके ह्मदय पर गहरा प्रभाव पड़ा।
  1915 में महात्मा गांधी का भाषण सुनने के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि वह अपना पूरा जीवन देश की सेवा में लगा देंगे। लाल बहादुर का जुड़ाव शुरू  से ही गांधी जी के अहिंसा आंदोलन के साथ रहा आैर वह अंत तक कांग्रेस से जुडे़ रहे। जब वह 17 वर्ष के थे तो गांधी जी के आह्वान 'अंग्रेजों के सरकारी स्कूल कालेजों का बहिष्कार करो" पर उन्होंने स्कूल छोड़ दिया, जबकि उनकी माता आैर संबंधियों ने उन्हें स्कूल न छोड़ने की सलाह दी क्योंकि उनका काशी विद्या पीठ में चौथा वर्ष था। वह विद्यालय नहीं गए। इस विरोध के कारण उन्हें गिरफ्तार करने के बाद चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। 1930 में जब गांधी जी ने 'नमक सत्याग्रह" शुरू   किया तो उसमें शास्त्री जी की मुख्य भूमिका रही। वह गांधी जी के स्वातंत्र्य वीरों की सेना के एक महान सेनानायक थे। 
     1928 में काशी विद्यापीठ से लाल बहादुर को 'शास्त्री" की डिग्री मिली। तब से वह श्रीवास्तव की जगह शास्त्री कह कर पुकारे जाने लगे। वह 1921 में लाला लाजपतराय द्वारा गठित 'पीपुल्स सोसायटी" के सदस्य भी रहे। सोसायटी का उद्देश्य युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रेरित करना था। बाद में उन्हें सोसायटी का अध्यक्ष बनाया गया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा।
1927 में शास्त्री जी का विवाह ललिता देवी से हुआ। उन्हें अपने ससुर से एक चरखा आैर कुछ गज खादी उपहार स्वरूप मिली। शास्त्री को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। उनकी गुरू  नानक देव में विशेष रू चि थी। शास्त्री जी को पढ़ने के अलावा क्रिकेट देखने आैर लिखने का भी शौक था। उन्होंने मैडम क्यूरी की जीवनी का हिन्दी में अनुवाद भी किया आैर कई यूरोपीय लेखकों की दार्शनिक आैर सामाजिक किताबों का भी अध्ययन किया।
शास्त्री जी छोटे कद के एक साधारण आैर सरल बोलचाल वाले ईमानदार व्यक्ति थे। इसी तरह उनका पहनावा भी साधारण था। उन्होंने परिवहन, रेलवे, पुलिस आैर गृह मंत्रालय आदि मंत्रालयों में जिम्मेदारीपूर्वक मंत्री के रूप में काम किया। वह राज्यसभा के सदस्य रहे। उन्होंने परिवहन मंत्री के अपने कार्यकाल में देश की पहली महिला कंडक्टर की नियुक्ति की।
शास्त्री ने पुलिस मंत्री रहते हुए लाठीचार्ज आैर फायरिंग को प्रतिबंधित किया। इसके लिए उन्हें बहुत ख्याति मिली। उन्होंने ही पुलिस को खाकी का ताज दिया। यह ताज पुलिस को कैसे मिला। इस पर एक घटना है। एक बार शास्त्री जी क्रिकेट मैच देखने कानपुर गए तो एक व्यक्ति ने पुलिस द्वारा पहनी गई लाल पगड़ी पर आपत्ति की, जिसके परिणामस्वरू प उन्होंने उस व्यक्ति से वादा किया कि वह इस विषय पर ईमानदारी पूर्वक विचार करेंगे। कुछ समय बाद पुलिस को लाल की जगह खाकी पगड़ी दी गई।
शास्त्री जी के रेल मंत्री के कार्यकाल में यात्रियों को प्रथम, द्वितीय आैर तृतीय श्रेणी की सुविधा प्राप्त हुई। उन्होंने रेलवे की तरक्की के लिए भरसक प्रयास किए। जब तमिलनाडु आैर महबूब नगर में रेल दुर्घटना हुई तो उन्होंने इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से तुरंत इस्तीफा दे दिया।  प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू  ने उनका इस्तीफा स्वीकार करने से मना कर दिया, लेकिन वह नहीं माने आैर उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार किया।
प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू  के निधन के बाद कश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी की जुबान पर यही प्रश्न था कि नेहरू  के बाद अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। कांग्रेस पार्टी ने लाल बहादुर शास्त्री को अपना नेता चुन इस प्रश्न को विराम दिया। उनके चरित्र को देखते हुए सभी इस निर्णय पर एकमत थे कि शास्त्री जी ही ऐसे व्यक्ति है. जो देश का सही नेतृत्व कर सकते है। शास्त्री जी ने स्वयं पर कभी दबाव महसूस नहीं किया। वह कहते थे कि 'मैं एक साधारण व्यक्ति हूं न कि कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति।"
नेहरू  जी के बाद उन्होंने भारतीय गणतंत्र के दूसरे प्रधानमंत्री के तौर पर कार्य करते हुए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए। उन्होंने सेना को ऐसे आधुनिक हथियार दिए जाने की वकालत की, जिन्हें वह युद्ध के समय केवल लड़ाई के लिए ही नहीं अपितु अपनी रक्षा के लिए भी प्रयोग कर सके। शास्त्री जी ने 1962 आैर 1965 के युद्ध के समय सेना का मनोबल बढ़ाया। देश को 'जय जवान, जय किसान" का नारा दिया। पाकिस्तान के साथ 1965 के युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के लाहौर शहर तक कब्जा कर लिया। जिसे बाद में ताशकंद समझौते के तहत पाकिस्तान को लौटाया दिया गया। इसी समझौते के बाद ताशकंद में 10 जनवरी 1966 में अचानक उनका निधन हो गया। उन्हें 'भारत रत्न" से भी सम्मानित किया गया।